146 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय
- ‘‘भिक्षु रट्ठपाल! निकट सम्बन्धियों की हानि क्या है? किसी के अनेक मित्र
और परिचित और सम्बन्धी हैं, किन्तु धीरे-धीरे ये सम्बन्धी समाप्त होते जाते
हैं। वह इस प्रकार विचार करता हैः ‘पहले मेरे पास अनेक मित्र और परिचित,
और सम्बन्धी थे, किन्तु धीरे-धीरे मेरे सम्बन्धी समाप्त हो गये हैं, अतः मेरे
लिए धन-सम्पत्ति इत्यादि अर्जित करना सरल नहीं है...., अतः वह संबंधियों की
इस हानिके पश्चात्, केश और दाढ़ी कटवा कर, काषाय-वस्त्र धारण करके,
गृह का परित्याग कर प्रव्रजित हो जाता है।’ इसे सम्बन्धियों के मरण से उत्पन्न
होने वाली हानि कहा जाता है। किन्तु तुम्हारे पास मित्रों और सम्बन्धियों का
पूरा जमघट है, तुम्हारी हानि ऐसी नहीं है, जो सम्बन्धियों की मृत्यु से उत्पन्न
होती है। तुमने ऐसा क्या जाना या देखा या सुना, जिसने तुम्हें प्रव्रजित होने को
बाध्य किया?’’
- भिक्षु रट्ठपाल ने उत्तर दिया, ‘‘राजन्! मैंने गृह का परित्याग किया और प्रव्रजित
हो गया, क्योंकि मैंने सम्यक सम्बुद्ध द्वारा प्रतिपादित निम्नलिखित चार बातों को
जाना, देखा और सुना है, जिन्हें वे जानते और देखते हैंः
(1) संसार अनित्य और परिवर्तनशील है।
(2) संसार का कोई संरक्षक या रक्षा करने वाला नहीं है।
(3) हमारा कुछ भी नहीं है, हमें निश्चय ही सभी कुछ छोड़ जाना है।
(4) तृष्णा के वशीभूत होकर अभावग्रस्त और संसार दुःखी रहता है।’’
- ‘‘यह अद्भुत है, यह आश्चर्यजनक है,’’ राजा ने कहा, ‘‘इस विषय में तथागत
का कथन कितना सत्य है!’’