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धारण करने, और गृह का परित्याग कर प्रव्रजित होने को विवश करती हैं-यथा (1) बुढ़ापा, (2) गिरता हुआ स्वाथ्य, (3) दरिद्रता और (4) निकट सम्बन्धियों की मृत्यु।’’
‘‘एक आदमी को लो, जो वृद्ध होने पर अधिक आयु हो जाने पर, जराजीर्ण हो जाने पर और जीवन के अन्त के निकट आने पर, अपनी स्थिति को महसूस कर और या तो नयी सम्पत्ति को अर्जित करने में या जो कुछ उसके पास है उससे ठीक से गुजारा करने में कठिनाई महसूस करता है, अतः वह प्रव्रजित होने का निर्णय करता है। इसे बुढ़ापे से उत्पन्न होने वाली हानि कहा जाता है। किन्तु यहाँ तुम तो यौवन के शीर्ष और जवानी की अवस्था में हो, कोयले के समान काले केशों की सम्पदा है, जिन्हें सफेदी छू भी नहीं पायी है और तुम्हारे यौवन की इस सुन्दरता में, बुढ़ाने द्वारा उत्पन्न हानि का कोई खतरा नहीं है। तुमने ऐसा क्या जाना या देखा या सुना जिसने तुम्हें प्रव्रजित होने को बाध्य किया?’’
‘‘या एक आदमी को लो, जो रोग-ग्रस्त होने पर या कष्ट में होने पर या गंभीर रूप से बीमार होने पर, अपनी स्थिति को महसूस कर और या तो नयी सम्पत्ति को अर्जित करने में या जो कुछ उसके पास है, उससे ठीक से गुजारा करने में कठिनाई महसूस करता है_ अतः वह प्रव्रजित होने का निर्णय करता है। इसे गिरते हुए स्वास्थ्य से उत्पन्न होने वाली हानि कहा जाता है। किन्तु यहाँ तुम न तो बीमार ही हो और न तुम्हें कोई कष्ट ही है, न तो अधिक गर्म और न ही अधिक ठण्डे तरल पदार्थ द्वारा पोषित अच्छी पाचन शक्ति सहित, तुम्हारी हानि ऐसी नहीं है जो गिरते हुए स्वास्थ्य के कारण उत्पन्न होती है। तुमने ऐसा क्या जाना या देखा या सुना, जिसने तुम्हें प्रव्रजित होने को बाध्य किया?’’
‘‘या एक आदमी को लो, जो धनी, सम्पत्तिवान और बहुत सम्पदा वाला रहने के बाद, और धीरे-धीरे उसे खाने पर, अपनी स्थिति को महसूस कर और या तो नयी सम्पत्ति को अर्जित करने में जो कुछ उसके पास है उससे ठीक से गुजारा करने में कठिनाई महसूस करता है_ अतः वह एक बेघर बनने का निर्णय करता है। इसे दरिद्रता से उत्पन्न होने वाली हानि कहा जाता है। किन्तु भिक्षु रट्ठपाल इसी ही थूल्लकोट्ठित के प्रमुख परिवार के पुत्र हैं और सम्पत्ति की हानि में से कोई भी भिक्षु रट्ठपाल के सम्मुख नहीं है। भिक्षु रट्ठपाल ने ऐसा क्या जाना या देखा या सुना कि वे गृह का परित्याग कर प्रव्रजित हो गये हैं?’’