150 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय
- अगली सुबह तथागत ने अपना भिक्षा-पात्र लिया और कपिलवस्तु में भिक्षाटन
के लिये निकल पड़े।
- और नगर में समाचार फैल गयाः ‘‘सिद्धार्थ नगर में एक घर से दूसरे घर भिक्षा
प्राप्त करने जा रहे हैं, जहाँ वे अपने परिजनों सहित एक रथ की सवारी किया
करते थे। उनका चीवर एक लाल-मिट्टी के रंग का है और उन्होंने अपने हाथों
में एक मिट्टी का पात्र लिया हुआ है।
- विचित्र जनश्रुति को सुन कर, शुद्धोदन अत्यंत शीघ्रता से दौड़े गये और कहा
,‘‘क्यों तुम मुझे इस प्रकार लज्जित करते हो? क्या तुम नहीं जानते हो कि मैं
आसानी से तुम्हारे और तुम्हारे भिक्षुओं के लिये भोजन उपलब्ध करा सकता
हूँ।’’
और बुद्ध ने उत्तर दिया, ‘‘यह मेरे वंश (संघ) की परम्परा है।’’
‘‘किन्तु ऐसा कैसे हो सकता है? तुम उनमें से एक नहीं हो, जिन्होंने कभी भी
भोजन के लिये भिक्षा मांगी हो।’’
- ‘‘हाँ, पिताजी! तथागत ने उत्तर दिया तुम और तुम्हारा वंश राजाओं के वंशज
होने का दावा कर सकते हैं, मेरा वंश प्राचीन बुद्धों का वंश हैं, उन्होंने अपना
भोजन भिक्षा से मांगा था और सदैव भिक्षा द्वारा ही जिये थे।’’
- शुद्धोदन ने कोई उत्तर नहीं दिया और तथागत ने आगे कहा, ‘‘यह प्रथा है, जब
किसी को एक छुपा खजाना मिले, तो उसे सबसे कीमती रत्न को अपने पिता
को भेंट करना चाहिये। अतः मुझे अपने इस खजाने को, जो धर्म है, आपको
भेंट करने दें।’’
- और तथागत ने अपने पिता से कहा, ‘‘यदि आप स्वयं को स्वप्नों से मुक्त करें,
यदि आप अपना चित्त सत्य के लिये खोल लें, यदि आप कर्मठ रहें, यदि आप
धर्मपरायण्ता का पालन करें, तो आपको परम सुख की प्राप्ति होगी।’’
- शुद्धोदन ने चुप रह कर ये वचन सुने और उत्तर दिया, ‘‘मेरे पुत्र! जो तुमने
कहा मैं उसे पूरी तरह आचरण करने का प्रयास करूँगा।’’
2. यशोधरा और राहुल से भेंट
- तब शुद्धोदन तथागत को अपने घर ले गये और परिवार के सभी सदस्यों ने
अत्यन्त श्रद्धा से उनका अभिवादन किया।