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- किन्तु राहुल की माता यशोधरा सामने नहीं आयीं। शुद्धोदन ने संदेश भिजवाया,
किन्तु उसने उत्तर दिया, ‘‘यदि मैं किसी सम्मान के योग्य समझी जाऊँगी तो
सिद्धार्थ यही मेरे पास आयेंगे और मुझसे मिलेंगे।’’
- तथागत ने, अपने सभी सम्बन्धियों और मित्रों का अभिवादन करने के पश्चात्
पूछा, ‘‘यशोधरा कहाँ?’’ और सूचित किये जाने पर कि उसने आने से इंकार
कर दिया है, वे तुरंत उठ खड़े हुए और उनके कक्ष में गये।
- तथागत ने अपने शिष्यों सारिपुत्र और मौद्गल्यापन को अपने साथ यशोधरा
के कक्ष तक चलने के लिये आमन्त्रित किया और कहा, ‘‘मैं मुक्त हूं, किन्तु
यशोधरा, तथापि, अभी तक मुक्त नहीं है। मुझे काफी लम्बे समय से न देखने
के कारण, वह अत्यन्त दुखी है। जब तक कि उसके दुख को आँसुओं के रास्ते
बह नहीं जाने दिया जायेगा, उसका हृदय भारी रहेगा। यदि वह तथागत का
स्पर्श भी करे, तुम लोग उसको रोकना नहीं।’’
- यशोधरा गहरी सोच में डूबी हुई अपने कक्ष में बैठी थी। जब तथागत ने प्रवेश
किया, वह अपने भक्ति बाहुल्य के कारण, एक लबालब भरे पात्र के समान,
स्वयं को रोकने में असमर्थ थी।
- यह भूल गई कि जिस व्यक्ति को वह प्रेम करती है वह बुद्ध है, संसार का
स्वामी है, सत्य का प्रचारक है, उसने उनके चरण पकड़ लिये और फूट-फूट
कर रोने लगी।
- लेकिन जब उसे ध्यान आया कि शुद्धोदन भी वहां आ गए थे, वह लज्जित हुई
और उठ खड़ी हुई तथा कुछ दूरी पर श्रद्धापूर्वक बैठ गयी।
- शुद्धोदन ने यशोधरा की ओर से क्षमा माँगते हुए कहा, ‘‘यह उसके गहरे लगाव
का परिणाम है, और क्षणिक भावना से अधिक है। सात वर्षों के दौरान जब से
उसने अपना पति खोया है, जब उसने सुना कि सिद्धार्थ ने अपना सिर मुंडवा
लिया है, उसने भी वैसा ही किया_ जब उसने सुना कि उन्होंने सुगंधित पदार्थों
और गहनों का प्रयोग छोड़ दिया है, उसने भी उनके प्रयोग से इन्कार कर दिया।
अपने पति की तरह उसने निश्चित समय पर केवल एक मिट्टी के पात्र में
भोजन किया है।’’
- ‘‘यदि यह एक क्षणिक भावुकता से अधिक है, इसके लिये साहस की आवश्यकता
नहीं है।’’
- तब तथागत ने यशोधरा को उसके महान् पुण्यों की याद दिलाई और उस महान