7. बुद्ध की दृढ़ता - Page 191

162 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय

  1. ‘‘अतः भले ही सूर्य पृथ्वी पर गिर पड़े, भले ही मालय पहाड़ अपनी दृढ़ता

खो दे, किन्तु मैं कभी भी एक सांसारिक मनुष्य की तरह अपने घर नहीं लौट

सकता हूँ।’’

  1. ‘‘मैं जलती हुई अग्नि में प्रविष्ट हो जाऊँगा, किन्तु अपने उद्देश्य के अपूर्ण रहते

अपने घर में नहीं लौटूंगा’’ उपेक्षत्व से परिपूर्ण अपने निश्चय के अनुरूप खड़े

हो कर, तथागत अपने मार्ग पर चल दिए।

  1. तब मंत्री और ब्राह्मण, नम आँखों से, उनका दृढ़ निश्चय सुनकर, कुछ देर तक

उन्हें उदास निगाहों से देखते हुए और दुख पर नियंण करके, धीरे से कपिलवस्तु

को लौट गये।

  1. राजकुमार के प्रति अपने प्रेम और राजा के प्रति भक्ति होने के कारण वे लौट

गये और प्रायः पीछे मुड़ कर देखने के लिये रुकते थे, वे न तो उन्हें मार्ग पर

जाते हुए देख सकते थे और न ही उनको आँखों से ओझल कर सकते थे,

-जो सूर्य के समान स्वयं अपने तेज से देदीप्यमान हो रहे थे और अन्य सभी

की पहुँच से परे थे।

  1. उनके घर लौटने के लिये राजी करने में असफल होकर, मंत्री और पुरोहित

एक दूसरे से बात करते हुए, लड़खड़ाते कदमों से लौट गये, ‘‘हम किस प्रकार

राजा के पास जाएंगे और उनसे मिलेंगे, जो अपने प्रिय पुत्र के लिए तड़फ रहे

हैं?’’