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- ‘‘और जहाँ तक आपके वन से अपने घर लौट आने के बारे में जीवन की
बुराइयों का विचार है, इस विचार से तुम्हें परेशान होने की आवश्यकता नहीं
है, पूर्व समय में भी लोग वनों से अपने घरों को लौटे हैं।’’ उन्होंने अम्बरीश,
दु्रमकेश, राम इत्यादि का उल्लेख किया।
7. बुद्ध की दृढ़ता
- तब मंत्री के स्नेहमय और निष्ठावान वचन सुनकर, जो राजा की आँखों के
समान था, अपने संकल्प पर दृढ़, राजा के पुत्र ने अपना उत्तर दिया, बिना कुछ
छोड़े या विस्थापित किये, न तो नीरस और न ही उतावलाः
- ‘‘यह सन्देह कि किसी चीज का अस्तित्व है या नहीं, किसी अन्य के वचनों
द्वारा मेरे लिये हल होने वाला नहीं है, तपश्चर्या या नैष्कर्म्य द्वारा सत्य को
निर्धारित करने के बाद, मैं स्वयं इससे सम्बन्धित जो कुछ भी सत्य है पुर्णरूपेण
समझ लूँगा।’’
- ‘‘मैं किसी सिद्धांत को स्वीकार करने वाला नहीं हूँ, जो अज्ञान पर निर्भर
है और पूर्णतया विवादास्पद हैं, मैं किसी ऐसे सिद्धांत को स्वीकार नहीं कर
सकता, जिसमें सैकड़ों पूर्वाग्रहों से अन्तर्ग्रस्त है, कौन बुद्धिमान मनुष्य दूसरों की
मान्यता पर विश्वास करेगा? मानव-जाति एक अन्धे व्यक्ति द्वारा अन्धकार में
दूसरे व्यक्ति को निर्देश दिये जाने के समान बनी हुई है।’’
- ‘‘किन्तु भले ही कोई सत्य और झूठ को नहीं पहचान सके यदि कोई अच्छाई
और बुराई के विषय में सन्देह हो, तो एक व्यक्ति को अपना चित्त अच्छाई
पर केन्द्रित करना चाहिये, सद्वृत्ति वाले के लिए थोड़ा व्यर्थ का परिश्रम भी
कल्याणकारी ही होगा है।’’
- ‘‘किन्तु यह देख कर कि ‘पवित्र परम्परा’ अनिश्चित है, यह समझो कि केवल
वही सही है, जो विश्वास योग्य लोगों द्वारा कहा गया है, और जानो कि
विश्वसनीयता का अर्थ दोषों की अनुपस्थिति है, वह जो दोषों से मुक्त है एक
असत्य नहीं बोलेगा।’’
- ‘‘और जहाँ तक आपने मेरे घर लौट जाने के सम्बन्ध में मुझ से कहा है, आपके
दिये गये उदाहरण कोई प्रामाणिक नहीं हैं, क्योंकि कर्त्तव्य का निर्धारण करने
के लिये, आप कैसे ऐसे लोगों का प्रामाणिक के रूप में उदाहरण दे सकते हैं,
जिन्होंने अपने संकल्पों को तोड़ दिया था।’’