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- अगली सुबह वापसी पर, उसकी पत्नी ने क्रोध से पूछा कि उसे ऐसा क्या कष्ट
मिला था कि वह पूरी रात बाहर रहा। इस पर उसने उत्तर दिया कि वह गुस्से
में नहीं था, बल्कि वह जेतवन में बुद्ध का धमोपदेश सुन रहा था।
- इस पर उसकी पत्नी ने बुद्ध को बुरी तरह गालियाँ देना प्रारम्भ कर दिया, और
कहा, ‘‘यह गौतम केवल एक पागल धर्म-प्रचारक है, जो लोगों को धोखा देता
है, इत्यादि’’।
- इस पर, वृक्ष-देवता ने कहा, ‘‘मैंने उसके कथनों का विरोध नहीं किया, बल्कि
उसके सामने हार मान ली और इस प्रकार जब मैं मृत्यु को प्राप्त हुआ तो मैंने
वृक्ष-देवता के रूप में जन्म लिया, किन्तु अपनी कायरता के कारण मैं इस वृक्ष
तक ही सीमित हूँ।’’ और तब उसने इन गाथाओं को सुनाया।
- ‘‘यज्ञ और अन्य अनुष्ठान आदि दिन-रात, दुःख देने वाले सतत भार और चिन्ता
के जनक हैं।’’
- ‘‘चिन्ता से मुक्त होने और दुःख को नष्ट करने के लिये, एक व्यक्ति को
अवश्यक ही (बुद्ध के) धर्म का पालन करना चाहिये, और जो ऋषियों के
धर्म के सभी सांसारिक नियमों से मुक्ति पानी चाहिये।’’
- ब्राह्मणों ने इन शब्दों को सुनकर स्वयं श्रावस्ती में उस स्थल पर जाने का निश्चय
किया और वे वहां पहुंचे जहाँ बुद्ध थे। उन्होंने तथागत को अपने आगमन का
उद्देश्य बताने पर, तथागत ने उनसे कहाः
- ‘‘भले ही मनुष्य बालों की जटाओं सहित नग्न रहे, या चाहे वह कुछ पत्तों या
छाल के कपड़ों से अपना शरीर ढके, या फिर वह स्वयं को धूल से ढके और
पत्थरों पर सोता हो, किन्तु तृष्णा से छुटकारा पाने में इन सबका क्या प्रयोग
है?’’
- ‘‘किन्तु वह जो न तो किसी से संघर्ष करता है और न हत्या करता है, या
अग्नि द्वारा किसी को नष्ट नहीं करता, वह जो दूसरे को हराकर विजय पाने
की अभिलाषा नहीं करता, वह जो संपूर्ण संसार के प्रति मैत्री-भावना रखता है,
ऐसी स्थिति में मनुष्य के लिए द्वेष या घृणा के लिये कोई स्थान नहीं है।’’
- ‘‘शान्ति (पुण्य) पाने के लिए प्रेतों को आहुति देना, या इस जीवन के बाद
(परलोक) पुरस्कार की आशा रखना, ऐसे व्यक्ति की प्रसन्नता उस व्यक्ति की
चौथाई प्रसन्नता के बराबर भी नहीं हैं, जो सत्पुरुषों का सत्कार करता है।’’