2. उत्तरवती के ब्राह्मणों की धर्म-दीक्षा - Page 195

166 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय

  1. ‘‘किन्तु बुद्धिमान व्यक्ति बुद्धिमान के साथ मेल-जोल रखकर वैसा ही चरित्र

पा लेता है, जिस प्रकार एक सुगंधित पदार्थ की महक उससे लग जाती है, तो

उसे स्पर्श करता है, प्रज्ञा में आगे बढ़ते हुए, शील का पालन करते हुए, वह

पूर्णता की ओर बढ़ता जाता है, और संतुष्ट होता है।’’

  1. सत्तर ब्राह्मण इन गाथाओं को सुनकर, संतुष्ट हो गये कि घर वापस लौटने और

व्यक्तिगत आसक्ति का आनन्द लेने की उनकी इच्छा बुरी विकृति थी जो उनसे

जुड़ी थी, ऐसे विचारों को त्याग कर, और आगे बढ़ते हुए, वे विहार आये, और

अन्ततोगत्वा अहत्व-पद को प्राप्त कर गये।

2. उत्तरवती के ब्राह्मणों की धर्म-दीक्षा

  1. एक बार बुद्ध श्रावस्ती के जेतवन में विहार कर रहे थे और मनुष्यों तथा देवताओं

के कल्याणार्थ धर्मोपदेश दे रहे थे, श्रावस्ती से पूर्व की ओर उत्तरवती नामक

जनपद में पाँच ब्राह्मणों का एक समूह रहता था।

  1. उन्होंने एक साथ गंगा नदी के किनारे एक निर्ग्रन्थ तपस्वी के पास जाने का

संकल्प किया, जो अपने शरीर पर रेत-मिट्टी लेपेटे एक ‘ऋषि’ की अवस्था

पाने का प्रयास कर रहा था।

  1. रेगिस्तानी रास्ते में उनको अत्यधिक प्यास लगी। दूर से एक वृक्ष को देखकर,

उन्हें उसके पास मानव-बस्ती पाने की आशा से, वे जल्दी से वहाँ पहुँचे, किंतु

उन्हें वहाँ जीवन का कोई चिन्ह नहीं मिला।

  1. इस पर वे जोर-जोर से विलाप करने लगे। अचानक उन लोगों ने वृक्ष पर

से वृक्ष-देवता की आवाज सुनी, जिसने उनसे पूछा, ‘‘तुम लोग! क्यों विलाप

कर रहे हो?’’ और कारण सुन कर, वृक्ष-देवता ने उन्हें यथेच्छ खाने-पीने को

दिया।

  1. ब्राह्मणों ने आगे बढ़ने से पहले, वृक्ष-देवता से पूछा कि वह पूर्व-जन्म में

क्या-क्या था, कि वह इस प्रकार वृक्ष-देवता होकर उत्पन्न हुआ।

  1. इस पर उसने बतलाया कि जब सुदत्त (अनाथपिण्डिक) ने बुद्ध को जेववनाराम

का दान दिया था, तब वह श्रावस्ती की सभा में सारी रात उपदेश सुनता रहा,

वहाँ से लौटते वक्त मैंने भिक्षुओं के पात्र को जल से भर लिया था, इस प्रकार

मैंने भिक्षुओं को जल-दान दिया था।