2. मेहतर सुणीत की धर्म-दीक्षा - Page 199

170 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय

1. नाई उपालि की धर्म-दीक्षा

  1. वापस लौटते समय नाई उपालि ने सोचा ‘‘शाक्य उग्र स्वभाव के लोग हैं। यदि

मैं इन आभूषणों के साथ वापस जाऊँगा, तो वे मुझे मार डालेंगे, यह सोचकर कि

मैंने अपने साथियों की हत्या की है और उनके आभूषणों के साथ भाग आया। क्यों

न मैं भी उसी मार्ग पर जाऊँ, जिधर शाक्य कुल के ये नवयुवक गये हैं?’’

  1. ‘‘निस्सन्देह क्यों मुझे ऐसा नहीं करना चाहिये? उपालि ने स्वयं से पूछा और

उसने आभूषणों की गठरी अपनी पीठ से उतारकर, यह कहते हुए, एक वृक्ष

पर लटका दीः ‘‘जो इसे पाये एक भेंट के रूप में ले जाये,’’ और शाक्य

नवयुवकों का पीछा करने के लिये लौट पड़ा।’’

  1. और शाक्यों ने उसे दूर से आते देखा और उसके पास आने परे वे उससे बोले,

‘‘अच्छा उपालि! तुम किसलिये वापस आये हो?’’

  1. तब उसने जो सोचा था वही उन्होंने उत्तर दिया। शाक्य युवकों ने कहा, ‘‘तुमने

अच्छा किया, उपालि कि तुम वापस नहीं लौट गये, क्योंकि शाक्य उग्र स्वभाव

वाले हैं, और तुम्हें मार भी सकते थे।’’

  1. वहाँ जाने के लिए नाई उपालि को अपने साथ ले लिया जहाँ तथागत थे। और

वहाँ आने पर, वे तथागत के समक्ष प्रणाम के लिये झुके और एक ओर आसन

ग्रहण किया। इस प्रकार बैठकर उन्होंने तथागत से कहाः

  1. ‘‘हम शाक्य, भगवान, अभिमानी स्वभाव के हैं। और यह नाई उपालि एक

लम्बे समय से हमारी सेवा करता आ रहा है। भगवान हम से पहले इसे संघ में

प्रवेश दें, जिससे कि हम इसे आदर और सत्कार दें और अपना ज्येष्ठ मान कर

इनके सामने हाथ फैलाकर प्रणाम करें। इस प्रकार हम में शाक्यों का अभिमान

विनम्र होगा।’’

  1. तब तथागत ने सर्वप्रथम नाई उपालि को प्रवेश दिया और तत्पश्चात् शाक्य कुल

के उन नवयुवकों को संघ की व्यवस्था में सम्मिलित किया।

2. मेहतर सुणीत की धर्म-दीक्षा

  1. राजगृह में सुणीत नामक एक मेहतर रहता था। गृहस्थों द्वारा सड़कों के किनारे

फेंके गये कूड़े-करकट को साफ कर सड़क पर झाडू लगाने वाले के रूप में

वह अपना जीविकोपार्जन किया करता था। उसका पेशा एक निम्न और वंशानुगत

पेशा था।