171
- एक दिन प्रातःकाल तथागत उठे, चीवर धारणा किया और बहुत से भिक्षुओं के
साथ भिक्षाटन के लिये राजगृह में चल पड़े।
- उस समय सुणीत सड़क साफ कर रहा था, कूड़ा-करकट, इत्यादि को इकट्ठा
कर ढेर लगा रहा था और उसे टोकरी में भर रहा था, जिसे वह गाड़ी में भर
कर ले जाने वाला था।
- जब उसने तथागत और उनके संघ को आते हुए देखा, उसका हृदय प्रसन्नता
और आश्चर्य से भर गया।
- सड़क पर छिपने का कोई स्थान न पाकर, उसने दीवार के एक मोड़ से सटकर
अपनी गाड़ी खड़ी कर दी और हाथ जोड़कर बुद्ध को प्रणाम करते हुए दीवार
से सटकर खड़ा हो गया।
- जब तथागत उसके कुछ समीप आये, तब उन्होंने दिव्य मधुर वाणी में उससे
कहा, ‘‘सुणीत! तुम्हारे लिये यह जीविका का तुच्छ साधन क्या है? क्या तुम
गृह-त्याग कर संघ में प्रविष्ट हो सकते हो?’’
- और सुणीत, जैसे व्यक्ति को ऐसा लगा कि उस पर अमृत की वर्षा हुई हो,
वह हर्षोन्माद अनुभव करते हुए बोला, ‘‘जिस संघ में भगवान बुद्ध हैं, उस संघ
में मैं कैसे नहीं आ सकता? कृपया भगवन्! मुझे संघ में प्रविष्ट कर लें।’’
- तब तथागत ने कहा, ‘‘आओ भिक्षु!’’ और इस एक वचन से ही सुणीत ने प्रव्रज्या
और उप-सम्पदा प्राप्त कर ली और पात्र तथा चीवर से युक्त हो गया।
- तथागत ने उसे विहार ले जाते हुए धर्म और विनय की शिक्षा दी और कहा,
‘‘शील, संयम और आत्म-नियन्त्रण द्वारा, मनुष्य शुद्ध बनता है।’’
- जब पूछा गया कि कैसे सुणीत इतना महान् बन गया, बुद्ध ने कहा, ‘‘जिस
प्रकार राजमार्ग पर एक कूड़े के ढेर पर सुगन्धित और मधुर कुमुदिनी खिल
सकती है, इसी प्रकार कूड़ा-करकट प्राणियों, अन्तर्दृष्टि से हुए अंधे सांसारिक
लोगों के मध्य बुद्ध के ऐसे पुत्र प्रकाशमान हो सकते हैं।’’
3. अछूत सोपाक और सुप्पिय की धर्म-दीक्षा
- सोपाक श्रावस्ती का एक अछूत था। उसके जन्म के समय, अपनी प्रसव वेदना
में उसकी माँ एक लम्बी गहरी मूर्छा में चली गयी, जिससे उसके पति और
सम्बन्धियों ने समझा, ‘वह मर गयी है।’ और वे उसे उठा कर श्मशान ले गये
और उसके शरीर को जलाने की तैयारी की।