176 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय
1. महाप्रजापति गौतमी, यशोधरा और अन्य स्त्रियों की प्रव्रज्या
- जब तथागत का कपिलवस्तु अपने पिता के घर आगमन हुआ था, तो संघ में
प्रविष्ट होने की शाक्य-स्त्रियों की इच्छा उतनी ही प्रबल थी, जितनी शाक्य-पुरुषों
के मध्य थी।
ऐसी स्त्रियों की अगुआ कोई अन्य नहीं स्वयं महाप्रजापति गौतमी थीं।
अब उस समय जब तथागत शाक्यों के मध्य निग्रोधाराम में ठहरे हुए थे,
महाप्रजापति गौतमी उनके पास गयी और बोली, ‘‘भगवान्! यह अच्छा होता,
यदि स्त्रियों को भी तथागत द्वारा उद्घोषित धर्म और विनय के अधीन परिव्राजक
बनने और संघ में प्रविष्ट होने की अनुमति मिल जाती।’’
- ‘‘ हे गौतमी! रहने दे, ऐसा विचार अपने मन में मत उत्पन्न होने दो।’’ दूसरी
और तीसरी बार भी महाप्रजापति ने वही निवेदन उन्हीं शब्दों में किया, और
दूसरी और तीसरी बार भी उन्हें वहीं उत्तर प्राप्त हुआ।
- तब महाप्रजापति गौतमी, दुखी और उदास तथागत के सामने सिर झुकाकर और
आँखों में आँसू लिये चली गयीं।
- तथागत द्वारा अपनी चारिका के लिये निग्रोधाराम छोड़ने के उपरान्त, महाप्रजापति
और शाक्य स्त्रियाँ एकत्रित हुईं और विचार करने लगीं कि तथागत के द्वारा
उनकी प्रार्थना स्वीकार न करने पर, अब आगे क्या किया जाए?
- शाक्य-स्त्रियाँ भगवान के इन्कार को अन्तिम निर्णय मानने को तैयार नहीं हुईं।
उन्होंने एक परिव्राजक के वस्त्र धारण करके और भगवान् के सम्मुख उपस्थित
होने का निश्चय किया।
- तद्नुसार महाप्रजापति गौतमी ने अपने केश काट डाले और काषाय वस्त्र धारण
किये तथा शाक्य वंश की अनेक स्त्रियों के साथ भगवान से मिलने के लिए
अपनी यात्रा पर चल पड़ीं, उस समय भगवान वैशाली के महावन में कूटगार
शाला में ठहरे हुए थे।
- यथासमय महाप्रजापति गौतमी अन्य स्त्रियों के साथ वैशाली पहुँचीं और सूजे
पाँवों और धूल में ढँकी कूटगार-शाला में आयी।
- पुनः उन्होंने वही प्रार्थना तथागत से की, जो उन्होंने तब की थी, जब वे
निग्रोधाराम में ठहरे हुए थे और उन्होंने पुनः उसे अस्वीकार कर दिया।
- दूसरी बार भी उनकी अस्वीकृति पाने पर महाप्रजापति वहां से पीछे हट गयी और