1. महाप्रजापति गौतमी, यशोधरा और अन्य स्त्रियों की प्रव्रज्या - Page 206

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यह न जानते हुए कि अब वह क्या करे कूटागार-शाला के प्रवेश द्वार के बाहर

खड़ी हो गयी थी। जब वे इस प्रकार खड़ी हुई थी, आनन्द ने कूटगार-शाला

जाते हुए उनको देखा और उनको पहचान लिया।

  1. उन्होंने तब महाप्रजापति से पूछा, ‘‘आप यहाँ क्यों खड़ी हैं, बरामदे के बाहर

सूजे हुए पैरों के साथ, धूल से ढँकी हुई यह दुखी आँखों में आँसू हैं और क्यों

रो रही हैं?’’ ‘‘क्योंकि, हे आनन्द! भगवान्, तथागत, स्त्रियों को अपने गृहों का

परित्याग करने और तथागत द्वारा उद्घोषित धर्म और विनय के अधीन परिव्रजित

अवस्था में प्रविष्ट होने की अनुमति नहीं देते हैं,’’ महाप्रजापति ने कहा।

  1. तब स्थविर आनन्द उस स्थल पर गये जहाँ तथागत थे, और तथागत के सामने

सिर झुका कर, एक ओर अपना आसन ग्रहण किया और इस प्रकार बैठे हुए,

स्थविर आनन्द ने तथागत से कहा, ‘‘भगवान्, देखिए, महाप्रजापति गौतमी बाहर

प्रवेश बरामदे के नीचे खड़ी हैं, सूजे पांवों और धूल से ढँकी हुई दुखी और

उदास, रोती हुई आँखों में आँसू लिये हुए, क्योंकि तथागत स्त्रियों को अपने

गृहों का परित्याग करने तथा तथागत द्वारा उद्घोषित धर्म और विनय के अधीन

परिव्रजित अवस्था में प्रविष्ट होने की अनुमति नहीं देते हैं। यह अच्छा होता,

भगवान्! यदि स्त्रियों को जैसी उनकी इच्छा है वैसी अनुमति दे दी जाती।’’

  1. ‘‘क्या महाप्रजापति गौतमी ने तथागत की विशेष सेवा नहीं की थी, तब मौसी

और परिचारिका के रूप में उन्होंने उन्हें पोषित किया और उनकी माता की

मृत्यु हो जाने पर तथागत को शिशु अवस्था में अपने स्तनों से दुग्ध-पान कराती

रही। अतः, यह अच्छा होता, भगवान् कि स्त्रियों को गृहस्थ जीवन का परित्याग

करने और तथागत के द्वारा उद्घोषित धर्म और विनय के अधीन परिव्राजित

अवस्था में प्रवेश करने की अनुमति प्रदान करें।’’

  1. ‘‘आनन्द! रहने दो। ऐसा न हो कि स्त्रियों को ऐसा करने की अनुमति मिले।’’

दूसरी बार और तीसरी बार भी आनन्द ने वही प्रार्थना की, उन्हीं शब्दों में, और

वही उत्तर पाया।

  1. तब स्थविर आनन्द ने तथागत से पूछाः ‘‘क्या कारण हो सकता है भगवान्,

स्त्रियों को प्रव्रज्या लेने की अनुमति की अस्वीकृति का?’’

  1. ‘‘भगवान् जानते हैं कि ब्राह्मण का मत है कि शूद्र और स्त्रियाँ कभी मोक्ष

प्राप्त नहीं कर सकते हैं, क्योंकि वे अशुद्ध और निम्न होते हैं। इसलिए वे शूद्रों

और स्त्रियों को प्रव्रज्या लेने की अनुमति नहीं देते। क्या तथागत भी वैसा ही

दृष्टिकोण रखते हैं, जैसा कि ब्राह्मणों का है?’’