2. प्रकृति नामक चाण्डालिका की प्रव्रज्या - Page 211

  1. तब लड़की स्वयं तथागत के सम्मुख गई और बोली, ‘‘मैंने अपना सिर मुँडवा

लिया है, जैसा आपने कहा था।’’

  1. तथागत ने तब उससे पूछा, ‘‘तुम क्या चाहती हो? उनके शरीर का कौन सा

अंग तुम्हें सबसे प्रिय है?’’ लड़की ने कहा, ‘‘मुझे उनकी नाक से प्यार है,

मुझे उनके मुँह से प्यार है, मुझे उनके कानों से प्यार है, मुझे उनकी आवाज से

प्यार है, मुझे उनकी आँखों से प्यार है और मुझे उनकी चाल से प्यार है।’’

  1. तथागत ने तब लड़की से कहा, ‘‘क्या तुम जानती हो कि आँखें आँसुओं का

घर है, नाक गन्दगी का घर है, मुँह थूक का घर है, कान मैल का घर है और

शरीर मल-मूत्र का पात्र है।’’

  1. ‘‘जब पुरुष और स्त्री समीप आते हैं, वे बच्चे पैदा करते हैं। किन्तु जहाँ जन्म

है, वहाँ मृत्यु भी है, जहाँ मृत्यु है, वहाँ दुःख भी है। लड़की! तुम आनन्द से

विवाह करके क्या पाने वाली हो। मैं नहीं जानता हूँ।’’

  1. लड़की ने गम्भीर चिंतन करना प्रारम्भ कर दिया और सहमत हो गयी कि

आनन्द से उसके विवाह का कोई उद्देश्य नहीं था, जिसके लिए वह दृढ़संकल्प

थी और उसने तथागत को बता दिया।

  1. तथागत का अभिवादन कर लड़की ने कहा, ‘‘अज्ञान के कारण मैं आनन्द

का पीछा कर रही थी। मेरा मन अब प्रबुद्ध है। मैं एक नाविक के समान हूँ,

जिसका जहाज एक दुर्घटना के बाद दूसरे किनारे पर जा पहुँचा है। मैं एक

अरक्षित वृद्ध व्यक्ति के समान हूँ, जिसे सुरक्षा मिल गयी है। मैं अन्धे के समान

हूँ, जिसे नयी दृष्टि प्राप्त हो गयी है। तथागत ने अपने ज्ञानामृत वचनों से मुझे

नींद से जगा दिया है।’’

  1. ‘‘तुम धन्य हो, हे प्रकृति! यद्यपि तुम एक चाण्डालिका हो, लेकिन तुम श्रेष्ठ

पुरुषों और श्रेष्ठ स्त्रियों के लिये एक आदर्श का काम करोगी। तुम निम्न जाति

की हो, किन्तु ब्राह्मण भी तुमसे शिक्षा ग्रहण करेंगे। न्याय तथा धर्मपरायणता

के मार्ग से विचलित मत होना और तुम राज-सिंहासन पर बैठी हुई रानियों की

राजसी कीर्ति को भी मात दे दोगी।

  1. विवाह असफल होने के पश्चात्, उसके लिये एकमात्र मार्ग भिक्खुनी संघ में

प्रविष्ट होना ही बच रहा था।

  1. अपनी इच्छा प्रकट करने पर उसे उसमें सम्मिलित कर लिया गया, यद्यपि वह

निम्नतम जाति से सम्बन्धित थी।