1. एक आवारा की धर्म-दीक्षा - Page 213

184 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय

1. एक आवारा की धर्म-दीक्षा

  1. प्राचीन काल में राजगृह में एक अत्यन्त उपद्रवी व्यक्ति रहता था, जो न तो

अपने माता-पिता का सम्मान करता था और न अपने से बड़ों का आदर करता

था, किन्तु जब उससे गलत कार्य हो जाता था, तो वह सदैव सूर्य, चन्द्र और

अग्नि-देव के यज्ञ और पूजा का सहारा लेता था, इस आशा से कि इससे पुण्य

मिलेगा और स्वयं में खुशी अनुभव करता।

  1. किन्तु पूजा और यज्ञ में अपना सम्पूर्ण शारीरिक परिश्रम होते हुए भी, उसे शान्ति

नहीं मिली, यहाँ तक कि तीन वर्ष तक दृढ़ता से यह सब करता रहा। 3. उसने अंत में बुद्ध के विषय में जानने के लिये श्रावस्ती जाने का निश्चय किया।

वहाँ पहुँचकर और उनके दर्शनों की कीर्ति देख कर, वह उनके पैरों में गिर

पड़ा और कहा कि वह कितना प्रसन्न हुआ।

  1. तब भगवान् ने पशु-बलि की मूर्खता और ऐसे सभी बाहरी कर्मकाण्डों में लगे

रहना व्यर्थ है, जिनका मन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। जिनमें आदरणियों का

आदर नहीं होता और उनके प्रति अपने कर्त्तव्यपूर्ण व्यवहार का जोन नहीं होता।

अंत में उन्होंने कुछ गाथाएं कहीं। उस समय उनके तेज से देदीप्यमान होकर

वह सारा स्थान और आस-पास का स्थान प्रकाशित हो गया। 5. इस पर गाँववासी, और विशेष कर बच्चों के माता-पिता उनकी पूजा करने के

लिये समीप आये।

  1. माता-पिताओं को देखकर, और बच्चों के उनके विवरण को सुन कर, बुद्ध

मुस्कराये, और इन गाथाओं का संगायन किया।

  1. ‘‘श्रेष्ठ मनुष्य लोभी इच्छा से पूर्णतया मुक्त होता है। वह ऐसे प्रकाशित युक्त

स्थल पर रहता है, जो-स्वयं प्रकाशमान रहता है। यद्यपि संयोग से उसे दुख

प्राप्त होते हैं। उस समय भी वह प्रसन्न होता है, बिना घबराये अपनी बुद्धि का

प्रदर्शन करता है।

  1. ‘‘भद्र पुरुष स्वयं को किसी सांसारिक कार्यकलाप से सम्बद्ध नहीं रखता,

सावधानी पूर्वक शीलों का पालन करते हुए और प्रज्ञा के पथ पर चलते हुए,

वह विचित्र सिद्धान्त (धन या सम्मान) के पीछे लालायित नहीं होता।’’ 9. ‘‘भद्र पुरुष अनित्यता के गुण को जानते हुए, और यह जानकर कि संसार बालू

के मध्य जमे एक वृक्ष के समान है अपने अस्थिर चित्त मित्र को स्थिरता के

पथ पर और अपने अपवित्र शील मित्र को पवित्रता के पथ पर लाने का पूरा

प्रयास करता है।’’