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2. डाकू अंगुलिमाल की धर्म-दीक्षा
- कोशल-नरेश प्रसेनजित् के राज्य में अंगुलिमाल नाम का एक डाकू रहता था,
जिसके हाथ हमेशा खून से लाल रंगे रहते थे, और किसी भी जीवित प्राणी के
लिए कोई दया नहीं दर्शाता था, जो सदैव हत्या और घायल करता रहता था।
उसके कारण, जो पहले गाँव थे, वे अब नहीं रहे थे, जो पहले नगर थे वे अब
नगर नहीं रहे थे, और जो पहले देहात थे वे अब देहात नहीं रहे थे। 2. जिस की वह हत्या करता था, उसकी एक अंगुलि अपने लिये एक माला बनाने
के लिये ले लिया करता था, और इस प्रकार उसका नाम ‘अंगुलिमाल’ पड़ा। 3. एक समय जब तथागत श्रावस्ती के जेतवनाराम में ठहरे हुए थे, तब उन्होंने डाकू
अंगुलिमाल द्वारा किये गये विध्वंस के विषय में सुना। तथागत ने उसको एक
धर्मपरायण मनुष्य में परिवर्तित करने का निर्णय लिया। अतः एक दिन अपना
भोजन ग्रहण करने और बिस्तर को एक ओर रखने के बाद अपना पात्र और चीवर
धारण कर, डाकू अंगुलिमान को खोजने की अपनी यात्रा पर निकल पड़े। 4. उन्हें उधर यात्रा पर जाते हुए देख कर, ग्वाले, गडरिए, हलवाहे और राही
चिल्ला उठे, ‘‘श्रमण उस रास्ते मत जाओ। यह आपको डाकू अंगुलिमाल तक
ले जायेगा।’’
- ‘‘क्योंकि, यहाँ तक कि जब दस, बीस, तीस या चालीस लोगों का दल एक
साथ इस रास्ते से यात्रा करता है, सम्पूर्ण दल डाकू के हाथों में जा गिरता है!’’
किन्तु, बिना एक भी शब्द बोले, तथागत अपने मार्ग पर चलते रहे। 6. दूसरी और तीसरी बार भी उन लोगों ने जो आस-पास थे तथा अन्य लोगों ने
भी अपनी चेतावनी दोहराई, किन्तु फिर भी, बिना एक भी शब्द बोले, तथागत
अपने मार्ग पर बढ़ते गये।
- कुछ दूर से ही डाकू ने तथागत को आते देखा और उसे अत्यन्त आश्चर्य हुआ
कि जहाँ यहाँ तक कि दस से पचास यात्रियों के दल भी उसके रास्ते पर आने
की हिम्मत नहीं करते, यह अकेला श्रमण एकाकी ही अपने मार्ग पर आगे
बढ़ता देखा जा सकता है और डाकू ने इस श्रमण की हत्या करने का मन बना
लिया। अतः, तलवार और ढाल तथा तीर और तरकश से लैस डाकू ने तथागत
का पीछा किया।
- तथागत, जबकि वे स्वयं अपनी स्वाभाविक गति से आगे बढ़ रहे थे, डाकू
अपने पूरे प्रयास से भी, उन्हें पकड़ नहीं पा रहा था।
- डाकू ने सोचा ‘‘यह एक अद्भुत और आश्चर्यजनक बात है। अब तक, मैं सदैव
एक हाथी, या घोड़ा, या गाड़ी या हिरण को जब वे पूरी गति से जा रहे होते थे,