200 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय
- बुद्ध के लिये ‘मुक्ति’ का अर्थ निर्वाण और निर्वाण का अर्थ है, राग-द्वेष की
आग का बुझ जाना।
- ऐसे धम्म में मुक्ति का आश्वासन या वचनबद्धता हो ही कैसे सकती है?
3. बुद्ध ने अपने लिए अथवा अपने धम्म के लिए किसी प्रकार के दैवत्व का दावा नहीं किया। उनका धम्म मनुष्य द्वारा मनुष्य के
लिए आविष्कृत था। यह एक अपौरुषेय धम्म नहीं था
- प्रत्येक धर्म के संस्थापक ने या तो अपने को ईश्वरीय कहा अथवा अपने धर्म
को ‘ईश्वरीय’ बताया।
- हजरत मूसा ने यद्यपि अपने लिये ‘ईश्वरीय’ उत्पत्ति का दावा नहीं किया है,
किन्तु अपनी शिक्षाओं को ईश्वरीय कहा है। उन्होंने अपने अनुयायियों से कहा
कि यदि वे दूध और मधु के देश में पहुँचने की इच्छा रखते हैं, तो वे उनकी
शिक्षाओं को स्वीकार करें क्योंकि वे ईश्वर की शिक्षायें हैं। 3. ईसा मसीह ने अपने लिए ‘ईश्वरीय’ होने का दावा किया था। उन्होंने दावा किया था
कि वे ईश्वर के पुत्र हैं। स्वाभाविक रूप से उनकी शिक्षाएं भी ईश्वरीय हो गई। 4. कृष्ण ने कहा कि वह स्वयं ईश्वर हैं और गीता स्वयं भगवान के वचन हैं। 5. तथागत ने कोई ऐसा दावा नहीं किया न तो अपने लिये या न अपने धर्म-शासन
के लिये।
- उन्होंने इतना ही दावा किया था कि वे अनेक मनुष्यों में से एक हैं और लोगों
को उनका सन्देश, मनुष्य का मनुष्य के लिये सन्देश है।
- उन्होंने अपने सन्देश के लिये कभी भी गलत न होने का दावा नहीं किया
था।
- उन्होंने केवल यही दावा किया था कि जैसा कि उन्होंने इसे समझा है उनका
सन्देश मुक्ति का एक सत्य मार्ग है।
- यह संसार में जीवन के सार्वभौमिक मानव अनुभव पर आधारित था।
- उन्होंने कहा कि प्रत्येक मनुष्य इसके लिए स्वतंत्र है कि वह इस पर प्रश्न करे,
इसका परीक्षण करे और खोजे कि इसमें क्या सत्य समाहित है। 11. अन्य धर्म के किसी भी दूसरे संस्थापक ने अपने धर्म को इस तरह परीक्षण
की कसौटी पर कसने की खुली चुनौती नहीं दी।