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- जब वह कहा जा चुका, गणक ब्राह्मण मोग्गल्लान ने तथागत से कहाः
- ‘‘लेकिन श्रमण गौतम! मुझे यह तो बतायें क्या आपके सभी शिष्य निर्वाण को
प्राप्त कर लेते हैं? या कुछ इसे प्राप्त करने में असफल रह जाते हैं? 31. ‘‘ब्राह्मण! कुछ मेरे श्रवण इस प्रकार मेरे द्वारा प्रशिक्षित होकर, निर्वाण प्राप्त
करते हैं, कुछ नहीं भी कर पाते हैं।’
- ‘‘किन्तु भ्रमण गौतम! इसका क्या कारण हैं? क्या हेतु है? श्रमण गौतम! यहाँ
निर्ब्बाण है। यही निर्ब्बाण का मार्ग है। यहाँ श्रमण गौतम जैसा योग्य प्रशिक्षक
के रूप में हैं। तो इसका क्या कारण है कि कुछ शिष्य इस प्रकार शिक्षा-प्राप्त
कुछ श्रवक निर्वाण प्राप्त करते है और कुछ नहीं कर पाते। लेकिन उसे जो
रास्ता बताया जाता है, उसे छोड़कर जबकि अन्य प्राप्त नहीं कर पाते?’’ 33. भगवान बुद्ध ने उत्तर दिया, ‘‘ब्राह्मण! यह ऐसा प्रश्न है, जिसका मैं उत्तर
दूँगा। किन्तु इससे पहले क्या तुम मुझे इसका उत्तर दोगे, जैसा कि तुम उचित
समझते हो। ब्राह्मण! अब यह बताओ कि क्या तुम राजगृह आने-जाने के मार्ग
से भली-भाँति परिचित हो?
- ‘‘श्रमण गौतम! निस्सन्देह मैं राजगृह आने-जाने के मार्ग से भली-भाँति परिचित
हूँ।’’
- (अब कोई एक आदमी आता है, और राजगृह जाने का मार्ग पूछता है।) लेकिन
उसे जो रास्ता बताया जाता है, उसे छोड़कर गलत मार्ग पकड़ लेता है, और
वह पूर्व के बजाय पश्चिम की ओर चला जाता है।
- ‘‘तब एक दूसरा मनुष्य आता है और तुमसे वह भी रास्ता पूछता है और तुम
उसे ठीक रास्ता बता देते हो। वह तुम्हारी सलाह का पालन करता है और
सुरक्षित राजगृह पहुंच जाता है।
- तब ब्राह्मण बोला, ‘‘तो मैं क्या करूँ, मेरा काम रास्ता बता देना है।’’
- भगवान बुद्ध बोले, ‘‘यही तो मैं इस विषय में कहता हूँ, ब्राह्मण? तथागत का
काम केवल मार्ग दिखाना है।’’
- यहाँ यह पूर्ण स्पष्ट कथन है कि वे तथागत मुक्ति नहीं देते। वह केवल मुक्ति
का मार्ग दिखलाते हैं।
इसके अतिरिक्त मुक्ति या निजात क्या है?
हज़रत मुहम्मद और ईसा मसीह के लिये मुक्ति या निजात का अर्थ है पैगम्बर
की मध्यस्थता के द्वारा रूह का दोजक़ जाने से बच जाना।