206 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय
1. जीवन की पवित्रता बनाये रखना धम्म है
(i)
- ‘‘ये तीन प्रकार की जीवन की पवित्रतायें हैं... शारीरिक पवित्रता किस प्रकार
की है?’’
- ‘‘इसमें एक मनुष्य जीव-हिंसा से, चोरी से और दुष्चरित जीवन से विरत होता
है। यह ‘शारीरिक पवित्रता’ कहलाती है।’’
‘‘और वाणी की पवित्रता किस प्रकार की है?’’
‘‘इसमें एक मनुष्य झूठ बोलने से विरत रहता है...........’’
‘‘और मन की पवित्रता किस प्रकार की है?’’
‘‘इसमें एक भिक्षु, यदि उसमें कुछ व्यक्तिगत काम-छन्द है तो वह जानता है
कि ‘मुझमें काम-छन्द है।’ यदि उसमें कोई भी काम-छन्द नहीं है, तो वह
जानता है कि उसमें काम-छन्द नहीं है। साथ ही वह इससे भी अवगत है कि
अनुत्पन्न काम-छन्दों की कैसे, उत्पत्ति होती है। वह जानता है, कैसे उनका
त्याग किया जाता है। वह यह भी जानता है कि कैसे भविष्य में इस प्रकार के
काम-छन्द उत्पन्न नहीं होंगे।’’
- ‘‘यदि उसमें कुछ व्यक्तिगत व्यापाद हैं, वह उनसे अवगत है, मुझमें व्यापाद
(द्वेष) हैं। साथ ही वह उनकी उत्पत्ति और तत्पश्चात् उनके त्याग, और कैसे
भविष्य में उनकी उत्पत्ति नहीं होगी इससे भी अवगत है।’’
- ‘‘यदि उसमें कुछ थीन-मिद्ध (स्त्यान-मृद्ध, आलस्य और तन्द्रा) की उत्पत्ति हुई
रहती है, तो यह जानता है कि मुझमें अलस्य-रान्द्रा उत्पन्न है। ... यदि उसमें
उद्धच्छ-कुकुच्च (उद्धतपन)........ यदि उसमें कुछ विचिकिच्छा (विचिकित्सा)
उत्पन्न है, तो वह जानता है कि कैसे उत्पन्न होते हैं, और किस प्रकार त्याग
दिये जाते हैं और भविष्य में पुनः उत्पन्न नहीं होते हैं। यह ‘तन की पवित्रता’
कहलाती है।’’
- ‘‘वह जो शरीर, वाणी और मन से पवित्र है।’’
‘‘निष्पाप, स्वच्छ तथा पवित्रता से युक्त है-’’
‘‘उसे लोग ‘निष्कलंक’ नाम से पुकारते हैं।’’