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(ii)
- ‘‘तीन प्रकार की पवित्रतायें हैं...... शारीरिक पवित्रता, वाणी की पवित्रता और
मन की पवित्रता।’’
‘‘शारीरिक पवित्रता किसे कहते हैं?’’
‘‘इसमें एक मनुष्य, जीव-हिंसा से, चोरी से, और काम-मिथ्याचार से विरत
रहता है। यह ‘शारीरिक-पवित्रता’ है।’’
‘‘वाणी की पवित्रता किसे कहते हैं।’’
‘‘इसमें एक मनुष्य झूठ बोलने से....... निरर्थक बातचीत करने से विरत रहता
है। यह ‘वाणी की पवित्रता’ कहलाती है।’’
‘‘और मन की पवित्रता किसे कहते है?’’
‘‘इसमें एक मनुष्य लोभी या ईष्यालु नहीं होता और सम्यक् दृष्टि रखता है।
यह ‘मन की पवित्रता’ कहलाती है। ये ही तीन प्रकार की पवित्रतायें हैं।’’
(iii)
- ये पाँच तरह की दुर्बलताएँ होती हैं, जिनसे साधना में बाधा पहुंचती है। कौन
सी पाँच?
- जीव-हिंसा, चोरी, काम-मिथ्याचार, झूठ_ और मादक पेय पदार्थों का सेवन, जो
आलस्य उत्पन्न करते हैं।
ये पाँच कारण हैं, जो असफलता की ओर ले जाते हैं।
जब साधना की ये पांचों बाधाएं दूर हो जाती हैं, तो चार स्मृति-उपट्ठान
(उपस्थान) की उत्पत्ति होनी चाहिये।
- इसमें एक भिक्षु कार्य के प्रति कायानुपश्यना करता हुआ बिहार करता है,
प्रयत्नशील, ज्ञानवान स्मृतिवान, प्रशान्त और संसार में विद्यमान (लोभ तथा
दौर्मनस्य) दोनों पर नियन्त्रण किये हुए विहार करता है।
वह वेदनाओं के प्रति वेदनानुपश्यी हो विहर करता हैख्...................,।
वह चित्त के प्रति चित्तानुपश्यी हो विहार करता हैख्.....................,।
वह धर्मों (चित्त में उत्पन्न होने वाले विचारों) के प्रति धर्मानुपश्यी हो, प्रयत्नशील,
स्मृतिवान् और प्रशान्त, संसार में विद्यमान लोभ ओर दौर्मनस्य दोनों पर नियन्त्रण
किये विहार करता है।