8. धर्म-ग्रन्थों की गलती को सम्भावना से परे मानना अ-धम्म है। - Page 283

254 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय

  1. ‘‘नहीं, तथागत!’’ कालामों ने कहा।

  2. ‘‘किन्तु हे कालामो! यही तो मैंने कहा है। मैंने कहा है कि जो कुछ तुमने

सुना है, केवल उस पर मत जाओ, जो कुछ परम्परा से प्राप्त हुआ केवल उस

पर मत जाओ, जो बहुतों द्वारा कहा गया है उस पर मत जाओ, जो धर्मग्रन्थों

में लिखा प्राप्त हुआ है केवल उस पर मत जाओ, तर्क की निपुणता पर मत

जाओ, तर्कशास्त्र की निपुणता पर मत जाओ, केवल न्याय ‘शास्त्र’ पर आधारित

विचारों पर ही मत जाओ, अनुकूल धारणाओं और मतों पर ही केवल मत जाओ,

जो प्रामाणिक प्रतीत होता है, केवल उस पर मत जाओ, कुछ श्रमणों या श्रेष्ठ

लोगों के द्वारा कही हुई बातों पर ही मत जाओ।’’

  1. ‘‘केवल जब तुम स्वयं मन के अनुभव से निस्सन्देह यह जान जाओ कि ये

बातें अहितकर हैं, ये बातें निन्दनीय हैं, ये बातें बुद्धिमान लोगों द्वारा निषिद्ध हैं,

ये बातें किये जाने पर या प्रयास करने पर कष्टकर और दुख की ओर ले जाती

हैं तब, कालामों! तुम्हें उनका त्याग कर देना चाहिये।’’

  1. ‘‘अद्भुत, तथागत, अत्यन्त अद्भुत है। हम तथागत आपकी तथा आपके धम्म

की शरण ग्रहण करते हैं। आज से जीवनपर्यन्त तक तथागत हमें अपने अनुयायियों

के रूप में स्वीकार करें, हम आपकी शरण में आते हैं।’’

  1. इस तर्क-वितर्क का सार स्पष्ट है कि किसी की शिक्षाओं को प्रामाणिक स्वीकार

करने से पहले, इस तथ्य पर मत जाओ कि यह धर्मग्रन्थों में समाहित है, तर्क

की निपुणता पर और न्याय-शास्त्र पर आधारित विचारों पर, केवल इस तथ्य

पर मत जाओ कि प्रतिपादित धारणाएं और मत अनुकूल हैं, केवल इसलिए मत

जाओ क्योंकि वे प्रामाणिक प्रतीत होते हैं, केवल इस तथ्य पर मत जाओ कि

धारणाएँ और मत वे हैं, जो कुछ श्रमणों या श्रेष्ठ लोगों के हैं।

  1. किन्तु इस बात पर ध्यान दो कि मन में बैठायी जाने वाली धाराणाएँ और मत

क्या हितकर हैं या अहितकर, निन्दनीय हैं या निर्दोष, कल्याण की ओर ले जाते

हैं या अकल्याण की ओर?

  1. केवल इन्हीं आधारों पर ही कोई किसी की शिक्षाओं को स्वीकार कर सकता

है।