8. धर्म-ग्रन्थों की गलती को सम्भावना से परे मानना अ-धम्म है। - Page 282

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  1. तथागत ने उत्तर दिया, ‘‘यही कसौटियाँ हैं, स्वयं अपने से पूछो, क्या हम

जानते हैं कि ये बातें अहितकर हैं, ये बातें निन्दनीय हैं, ये बातें बुद्धिमानों

द्वारा निन्दनीय कहीं गयी हैं, इन बातों को किये जाने पर या प्रयास करने पर

ये कष्ट और दुख की ओर ले जाती हैं।’’

  1. ‘‘कालामो, तुम्हें यह भी देखना चाहिये और पूछना चाहिये कि क्या विशेष मत

तृष्णा, घृणा, मूढ़ता और हिंसा को बढ़ावा देता है।’’

  1. ‘‘कालामो! तुम्हें यही पर्याप्त नहीं है। तुम्हें यह भी जानना चाहिये और देखना

चाहिये कि क्या मत एक मनुष्य को उसकी इंद्रियों का गुलाम तो नहीं बना रहा,

उसे सजीव प्राणियों के वध की ओर तो नहीं ले जा रहा, उसे चोरी करने की

प्रेरणा तो नहीं देता, उसे दूसरों की पत्नी के पीछे तो नहीं लगाता, झूठ बोलने

को प्रेरित तो नहीं करता और दूसरों को उसी समान कर्म करने को प्रवृत्त तो

नहीं करता?’’

  1. ‘‘और अंत में तुम्हें अपने से पूछना चाहिये, ‘क्या यह कष्ट और दुख की ओर

तो नहीं ले जाता है?’’

  1. ‘‘हे कालामो! अब तुम क्या सोचते हो?’’

  2. ‘‘क्या ये बातें मनुष्य के लिए अहितकर हैं या हितकर?’’

  3. ‘‘उसके लिए अहितकर हैं तथागत!’’ कालामों ने उत्तर दिया।

  4. ‘‘तुम क्या सोचते हो, कालामो क्या ये चीजें लाभप्रद हैं या हानिकारक?’’

  5. ‘‘ये हानिकार हैं, तथागत!’’

  6. ‘‘क्या ये वस्तुयें निन्दनीय हैं?’’

  7. ‘‘निन्दनीय, तथागत!’’ कालामों ने उत्तर दिया।

  8. ‘‘बुद्धिमान लोगों द्वारा निषिद्ध हैं या समर्थित हैं?’’

  9. ‘‘बुद्धिमान लोगों द्वारा निषिद्ध,’’ कालामों ने उत्तर दिया।

  10. ‘‘किये जाने या प्रयास करने पर, क्या उनसे कष्ट और दुख होता है?’’

  11. ‘‘किए जाने या प्रयास करने पर, तथागत! ये कष्ट और दुख की ओर ले जाते

हैं।’’

  1. ‘‘कोई धर्मग्रन्थ जो ऐसा सिखाता हो क्या गलती की सम्भावना से परे स्वीकार

किया जा सकता है या स्वतः प्रमाण माना जा सकता है?’’