256 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय
परिच्छेद एक
(क) सद्धम्म के कार्य
मन के मैल को दूर कर उसे निर्मल बनाना।
संसार को एक धम्म-‘राज्य’ बनाना।
परिच्छेद दो
(ख) धम्म तभी सद्धम्म हो सकता है, जब वह प्रज्ञा की वृद्धि करे।
- धम्म तभी सद्धम्म है, जब वह सभी के लिए ज्ञान के द्वार खोल दे।
- धम्म तभी सद्धम्म है, जब वह यह भी शिक्षा देता है कि केवल ‘विद्वान’ होना
पर्याप्त नहीं, इससे मनुष्य पंडिताऊपन’ की ओर अग्रसर हो सकता है। 3. धम्म तभी सद्धम्म है, जब वह सिखाता है कि जिस चीज की आवश्यकता है
वह प्रज्ञा है।
परिच्छेद तीन
(ग) धम्म सद्धम्म हो सकता है, जब वह मैत्री की वृद्धि करे।
- धम्म केवल तभी सद्धम्म है, जब वह शिक्षा देता है कि मात्र प्रज्ञा ही पर्याप्त
नहीं है इसके साथ शील का होना अनिवार्य है।
- धम्म केवल तभी सद्धम्म है, जब वह शिक्षा देता है कि प्रज्ञा और शील के
साथ-साथ करुणा का भी होना अनिवार्य है।
- धम्म केवल तभी सद्धम्म है, जब वह यह शिक्षा देता है कि करुणा से भी
अधिक मैत्री की आवश्यकता है।
परिच्छेद चार
(घ) धम्म तभी सद्धम्म हो सकता है, जब वह समस्त सामाजिक
(भेद-भावों के) प्रतिबन्ध मिटा दे।
- धम्म तभी सद्धम्म है जब वह मनुष्य-मनुष्य के बीच अवरोधों (दीवारों) को
मिटा दें।
- धम्म तभी सद्धम्म है, जब वह यह शिक्षा दे कि मनुष्य का जन्म से नहीं
बल्कि योग्यता के आधार पर मूल्यांकन किया जाना चाहिए। 3. धम्म तभी सद्धम्म है जब वह मनुष्य-मनुष्य के मध्य समानता की अभिवृद्धि करे।