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परिच्छेद एक
(क) सद्धम्म के कार्य
1. मन के मैल को दूर कर उसे निर्मल बनाना
- एक बार जब भगवान बुद्ध श्रावस्ती में विहार कर रहे थे, तब कोसल नरेश
प्रसेनजित वहां आया जहां वे ठहरे हुए थे और अपने रथ से उतर कर अत्यन्त
श्रद्धापूर्वक तथागत के पास गया।
- उसने तथागत से प्रार्थना की, कि कल के लिए उसका निमंत्रण स्वीकार करें।
उसने दूसरे दिन नगर में सार्वजनिक धर्मोपदेश देने के लिए भी प्रार्थना की,
ताकि लोग उनके और उनके दर्शन की श्रेष्ठता जान सकें, उनका उपदेश सुन
उसे ग्रहण कर सकें।
- भगवान बुद्ध ने स्वीकार करके, अगले दिन अपने सभी भिक्षु-संघ के साथ नगर
में प्रवेश किया और नगर के चौराहों से गुजरते हुए, वे पूर्व निश्चित स्थान तक
आये और बैठ गये।
- भोजनोपरान्त राजा ने तथागत से प्रार्थना की, कि चार राजमार्गों के मध्य उन्होंने
खुली सभा में उपदेश देने की कृपा करें, उस समय श्रोतागण बहुत बड़ी संख्या
में थे। तथागत ने अपना उपदेश देना आरम्भ किया।
उस समय श्रोताओं में दो व्यापारी भी उनके धर्मोपदेश को सुन रहे थे।
उनमें से एक ने चिन्तन किया, ‘‘राजा ने यह कितनी बड़ी बुद्धिमानी की बात
की है कि इस प्रकार के धर्मोपदेश सार्वजनिक रूप से प्रतिपादित कराया है!
इनकी उपयुक्तता कितनी व्यापक है, इनके गुण कितने गंभीर हैं!’’
- दूसरे ने इस प्रकार चिन्तन किया, ‘‘राजा ने यह कितनी बड़ी मूर्खता की है कि
इस व्यक्ति को यहां उपदेश देने के लिये बुलवाया है।’’
- ‘‘जिस प्रकार बछड़ा गाय के पीछे-पीछे यहां और वहां चलता है, उस गाड़ी से
बंधा हुआ जिसे वह खींचती हैं, मिमियाते हुए जैसे वह चलता है, उसी प्रकार
यह बुद्ध है जो राजा का अनुसरण करता है।’’ दोनों व्यापारी नगर से विदा
होकर एक सराय में आये जहां वे ठहर गये।
- थोड़ा सा सुरा-पान करते समय भले व्यापारी को सद्वृत्ति के चातुर्महाराजिक
देवताओं ने संयत और सुरक्षित रखा, जो संसार की देख-देख करते हैं।