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1. धर्म क्या है?

  1. ‘धर्म’ (Religion) शब्द एक अनिश्चित एवं अस्पष्ट शब्द है, जिसका कोई

निश्चित अर्थ नहीं है।

  1. ‘धर्म’ एक शब्द है, जिसके अनेक अर्थ हैं।

  2. इसका कारण यह है कि ‘धर्म’ अनेक अवस्थाओं से होकर गुजरा है। प्रत्येक

अवस्था में धारणा को धर्म कहा जाता है, हालाँकि एक अवस्था में धारणा

का वही अर्थ नहीं रहा है जो उसका अर्थ पूर्व अवस्था में था या आने वाली

अवस्था में होनेवाला होगा।

  1. ‘धर्म’ की अवधारणा कभी निश्चित नहीं रही है।

  2. यह हर काल में बदलती रहती है।

  3. एक समय ऐसा था, जब बिजली, वर्षा और बाढ़, जिनका घटित होना आदि

मानव की समझ से परे था, इन तथ्यों को नियंत्रित करने के लिये किया जाने

वाला कोई भी अनूठा कृत्य जादू कहा जाता था। अतः ‘धर्म’ जादू के रूप में

पहचाना जाने लगा।

  1. तब धर्म के विकास की दूसरी अवस्था आयी। इस अवस्था में धर्म की पहचान

मान्यताओं, कर्म-काण्डों, रीति-रिवाजों, प्रार्थनाओं और बलियों से की गयी। 8. किन्तु धर्म की यह अवधारणा व्युत्पन्न (अमौलिक व नकली) है। 9. ‘धर्म’ का केन्द्र बिन्दु इस मान्यता के साथ प्रारम्भ होता है कि कोई ऐसी शक्ति

विद्यमान है, जो इन तथ्यों का कारण है, जिन्हें आदि-मानव नहीं जानता था

और नहीं समझ सकता था। इस (दूसरी) अवस्था में जादू ने अपना स्थान खो

दिया।

  1. आरम्भ में यह शक्ति अपकारी थी। किन्तु बाद में यह अनुभव किया गया कि

वह परोपकारी भी हो सकती है।

  1. ये विश्वास व मान्यतायें, कर्म-काण्ड, रीति-रिवाज और बलियाँ एक परोपकारी

शक्ति को संतुष्ट करने और एक क्रोधी शक्ति को शान्त करने, दोनों के लिये

ही आवश्यक थे।

  1. आगे चलकर वह शक्ति ‘ईश्वर’, ‘परमात्मा’ या ‘सृष्टिकर्त्ता’ कहलाई।
  2. तब ‘धर्म’ की तीसरी अवस्था आयी जब यह माना जाने लगा कि यही ईश्वर