288 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय
है, जिसने इस संसार और मानव की सृष्टि की थी।
- इसके बाद ‘धर्म’ में मान्यता भी प्रचलित हुई कि मनुष्य के पास एक आत्मा
है और आत्मा शाश्वत है और संसार में मनुष्य के कार्यों के लिये ‘ईश्वर’ के
प्रति उत्तरदायी है।
संक्षेप में, यह धर्म की धारणा के विकास का इतिहास है।
अब धर्म का यही अभिप्राय है और यह अब यही दर्शाता है-ईश्वर में विश्वास,
आत्मा में विश्वास, ईश्वर की पूजा, भ्रमित आत्मा का सुधार, प्रार्थनाओं,
रीति-रिवाजों, बलियों, इत्यादि द्वारा ईश्वर को सन्तुष्ट करना।
2. धम्म से धर्म कैसे भिन्न है?
- भगवान बुद्ध जिसे ‘धम्म’ कहते हैं, वह धर्म कहे जाने से मूलतः भिन्न है।
- भगवान बुद्ध जिसे धम्म कहते हैं, वह उसके सदृश है, जिसे धर्मतत्त्वज्ञ यूरोपियन
‘रिलिजन’ (Religion) या धर्म कहते हैं।
- किन्तु दोनों के मध्य कोई विशेष समानता नहीं है। दूसरी ओर, दोनों के मध्य
अन्तर बहुत अधिक है।
- इसलिए कुछ यूरोपियन धर्मतत्त्वज्ञ भगवान बुद्ध के धम्म को रिलिजन स्वीकार
करने से इन्कार करते हैं।
- इस पर खेद करने की आवश्यकता नहीं है। हानि उनकी ही है। इससे भगवान
बुद्ध के ‘धम्म’ की कोई क्षति नहीं है। बल्कि यह स्पष्ट करता है कि रिलिजन
में क्या कमी है।
- इस विवाद में पड़ने की अपेक्षा यह अच्छा है कि हम यह बताएं कि ‘धम्म’
का विचार क्या है और वह धर्म या रिलिजन से कैसे भिन्न है। 7. यह कहा जाता है कि धर्म या रिलीजन व्यक्तिगत है और मनुष्य को इसे अपने
तक ही रखना चाहिये। किसी मनुष्य को इसकी सार्वजनिक जीवन में भूमिका
नहीं निभानी चाहिये।
- इसके विपरीत ‘धम्म’ सामाजिक है। यह मूलभूत रूप से और आवश्यक रूप
से ऐसा है।
- धम्म सदाचरण है, जिसका अर्थ जीवन के सभी क्षेत्रों में एक मनुष्य का और