6. केवल नैतिकता ही पर्याप्त नहीं है। उसे पवित्र और व्यापक भी होना चाहिए। - Page 327

298 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय

  1. सामान्य आदर्शों और सामान्य मानदण्डों के अभाव में समाज पूर्णतया सुव्यवस्थित

नहीं हो सकता।

  1. इतने विभिन्न आदर्शों और मानदण्डों के होते हुए एक व्यक्ति के लिये मानसिक

सामंजस्य बनाए रखना असम्भव होगा।

  1. जब एक समूह की दूसरे समूहों पर प्रभुता उसके विवेकपूर्ण और आनुपातिक

दावों का ध्यान रखने पर आधारित होती है तो वह समाज को अपरिहार्य रूप

से संघर्ष की ओर ले जाती है।

  1. संघर्ष को रोकने का एकमात्र तरीका यही है कि सभी के लिए नैतिकता के

सामान्य नियम समान हों जो सभी के लिये पवित्र हों।

  1. एक तीसरा कारण यह भी है, जो नैतिकता को पवित्र और सर्वव्यापक बनाने

की अपेक्षा रखता है। वह है व्यक्ति के विकास को सुरक्षित रखने के लिये। 34. ‘जीवन-संघर्ष’ या वर्ग-विशेष के शासन के अधीन व्यक्तियों के हित सुरक्षित

नहीं हैं।

  1. दलगत व्यवस्था व्यक्ति को अविरोधी-भावना प्राप्त करने से रोकती है, जो केवल

तभी सम्भव है, जब समाज के पास सामान्य आदर्श, सामान्य जीवन-माप हों।

उसके विचार भटक जाते हैं और वह एकता को देखने के लिये मानसिक तौर

पर बलात् और विकृत हो जाता है।

  1. दूसरे, दलगत व्यवस्था पक्षपात और न्याय की अस्वीकृति की ओर ले जाती है।
  2. दलगत व्यवस्था वर्गों के स्तर-विन्यास की ओर ले जाती है। वे जो स्वामी हैं, स्वामी

ही बने रहते हैं और वे जो दासता में जन्में हैं, दास ही बने रहते हैं। मालिक सदैव

मालिक बने रहते हैं और मजदूर सदैव मजदूर बने रहते हैं। विशिष्ट अधिकारी सदैव

विशिष्ट अधिकारी बने रहते हैं और दास सदैव दास बने रहते हैं। 38. इसका तात्पर्य यह है कि कुछ लोगों के लिये ही स्वतन्त्रता हो सकती है,

किन्तु सभी के लिये नहीं। इसका तात्पर्य है कि कुछ लोगों के लिये समानता

हो सकती है किन्तु अधिकांश लोगों के लिये बिल्कुल नहीं। 39. इसका उपचार क्या है? इसका एकमात्र उपचार है कि भ्रातृ-भावना को सार्वभौमिक

रूप से प्रभावशाली बनाया जाये।

  1. भ्रातृ-भावना क्या है? यह कुछ नहीं है, बल्कि मनुष्यों के भाईचारे का दूसरा

नाम है, जो नैतिकता का दूसरा नाम है।

  1. इसीलिए बुद्ध ने उपदेश दिया है कि ‘धम्म’ नैतिकता है और जिस प्रकार ‘धम्म’

पवित्र है उसी प्रकार ‘नैतिकता’ भी पवित्र है।