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- बहुत प्राचीन काल के दौरान किसी न किसी ने अवश्य यह प्रश्न उठाया होगा
कि क्या योग्यतम (सबसे सशक्त) ही सर्वश्रेष्ठ है? क्या जो निर्बलतम है,
यदि उसे भी संरक्षण देकर यदि बचाया जाए, तो क्या आगे चलकर समाज के
कल्याण की दृष्टि से आगे बढ़ाने में वह श्रेष्ठ नहीं हो सकता? 15. प्रतीत होता है कि समाज की उस समय की प्रचलित अवस्था ने सकारात्मक
उत्तर अवश्य दिया होगा।
तब प्रश्न उठता है निर्बल के संरक्षण का क्या उपाय है?
जो योग्यतम (सबसे अधिक शक्तिशाली) हो, उस पर कुछ प्रतिबन्ध लगाने से
काम नहीं चल सकता था।
- इसी स्थिति में नैतिकता की उत्पत्ति और आवश्यकता छिपी हुई है।
- इसमें नैतिकता को पवित्र बनाया जाना ही आवश्यक था, क्योंकि वे पाँबंदियाँ
(प्रतिबंध) मूलतः योग्यतम्, (सर्वाधिक शक्तिशाली) अर्थात् सबसे सशक्त
व्यक्तियों पर लगाई गयी थीं।
इसके अत्यन्त गम्भीर परिणाम हो सकते थे।
पहला, क्या नैतिकता सामाजिक बनने के बजाए, वह असामाजिक तो नहीं बन
जाती है?
- ऐसा नहीं है कि चोरों के बीच कोई नैतिकता नहीं होती। व्यापारियों के मध्य भी
नैतिकता होती है। एक जाति के लोगों में भी नैतिकता होती है, तथा डाकुओं
के एक दल के मध्य भी नैतिकता होती है।
- किन्तु यह नैतिकता अलगाव और अपने में ही सीमित रहने की भावना द्वारा
व्यक्त है। जब यह नैतिकता ‘‘दल विशेष के स्वार्थों’’ के संरक्षण के लिये होती
है, तब यह असामाजिक होती है।
- इस प्रकार की नैतिकता का अलगाव और अपने तक सीमित रहने की भावना
ही है, जो इसकी असामाजिक भावना को मुक्ति प्रदान करती है। 25. यही बात वहाँ भी सत्य है कि जहाँ एक समूह स्वयं अपने स्वार्थ-संरक्षण के
लिये नैतिकता का पालन करता है।
समाज के इस समूह-संगठन के परिणाम दूरगामी होते हैं।
यदि समाज असामाजिक समूहों में बना रहेगा, तो समाज एक असंगठित और
दलगत समाज ही बनकर रह जायेगा।
- एक असंगठित और दलगत अवस्था के समाज का खतरा यही है कि यह अनेक
विभिन्न आदर्श और मानदण्ड निर्धारित कर लेता है।