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विभाग - 1
पुनर्जन्म
1. प्रारम्भिक
- प्रायः ऐसा प्रश्न है ? पूछा जाता है कि मरणोपरान्त क्या होता है?
- इस सन्दर्भ में बुद्ध के समकालीन आचार्य दो भिन्न दृष्टिकोण रखते थे। एक
वर्ग शाश्वतवादी कहलाता था और दूसरा उच्छेदवादी कहलाता था।
- शाश्वतवादी कहते थे कि आत्मा कभी मरती ही नहीं, इसलिए वह शाश्वत है।
पुनर्जन्म द्वारा इसका नवीकरण हो जाता है।
- उच्छेदवादियों का सिद्धांत केवल उच्छेदवाद शब्द से समझा जा सकता था,
जिसका अर्थ था कि प्रत्येक वस्तु का अन्त है। मरणोपरान्त कुछ भी शेष नहीं
रहता।
- भगवान बुद्ध शाश्वतवादी नहीं थे, क्योंकि इसका तात्पर्य यह था कि वे एक
पृथक नित्य आत्मा के अस्तित्व में विश्वास नहीं करते थे, जो विश्वास करते
थे, जिसके वे विरोधी थे।
- तो क्या बुद्ध उच्छेदवादी थे? जब वे आत्मा के अस्तित्व पर विश्वास करते थे,
तो बुद्ध स्वाभाविक रूप से एक उच्छेदवादी कहलाए जाएंगे। 7. किन्तु अलगद्दुपम-सुत्त में बुद्ध शिकायत करते हैं कि वे एक उच्छेदवादी कहे
जाते हैं, जबकि वास्तव में वे नहीं हैं।
- इस सन्दर्भ में उन्होंने कहा है, ‘‘यद्यपि यही मत है, जिसे मैं दृढ़तापूर्वक कहता
हूँ और जिसका मैं उपदेश देता हूँ, फिर भी कुछ श्रमण और ब्राह्मण, गलत ढंग
से, भ्रांतिवश और झूठ-मूठ मुझ पर तथ्यों को चुनौती देते हुए आरोप लगाते हैं
कि मैं एक उच्छेदवादी हूँ और मनुष्यों के विघटन, विनाश और विध्वंस का
उपेदश देता हूँ।’’
- ‘‘यह ऐसा मत, जो मेरा नहीं है, और मैं दृढ़तापूर्वक इनकार करता हूँ, यह
गलत ढंग से, भ्रांतिवश और झूठ-मूठ मुझ पर आरोप लगाये गए हैं, उन भले
लोगों द्वारा जो मुझे एक उच्छेदवादी सिद्ध करना चाहते हैं।’’ 10. यदि यह कथन यथार्थ है और ऐसे लोगों के द्वारा प्रक्षिप्त नहीं है, जो बौद्ध
धम्म पर एक ब्राह्मणवादी सिद्धान्त थोप देना चाहते हैं, तो इस कथन से मन
में गम्भीर दुविधा उत्पन्न हो जाती है।