332 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय
- मनुष्य स्वयं ही अपना स्वामी है और दूसरा कौन स्वामी हो सकता है? जो
मनुष्य भली-भांति अपने आप को संयत रखता है, वह मनुष्य दुर्लभ स्वामित्व
को प्राप्त कर सकता है।
- जो मूर्ख मनुष्य अर्हतों के, आर्यों अथवा शीलवानों शासन को तिरस्कार की
दृष्टि से देखता है और मिथ्या-दृष्टि का अनुकरण करता है, वह स्वयं अपने
विनाश का उसी प्रकार कारण बनता है, जैसे कि काष्ठ सरकंडे के फल। 5. मनुष्य अपने आप ही पाप-कर्म करता है, अपने आप ही कष्ट सहन करता
है। अपने आप ही बुराई को छोड़ देता है, और अपने आप ही शुद्ध होता है।
शुद्धि और अशुद्धि अपने आप से होती है, कोई किसी दूसरे को शुद्ध नहीं कर
सकता है।
- जो केवल सुखों की ही खोज करना पसन्द करता है, जो इन्द्रियों में असंयमित
है, जो अपने भोजन में अमर्यादित है, आलसी और दुर्बल है, उस आदमी को
अपने असंयत कर्म ही ऐसे पछाड़ देते हैं, जैसे वायु एक निर्बल वृक्ष को। 7. जो सुखों की खोज किये बिना जीवन जीता है, जिसकी इन्द्रियाँ भली-भाँति
संयमित हैं, जो अपने भोजन में मर्यादित है, श्रद्धावान और वीर्यवान है, वह
उसी प्रकार पछाड़ नहीं खा सकता, जैसे वायु से चट्टानी पर्वत। 8. यदि आदमी अपने-आप को प्रिय समझता है, तो उसे अपने आप पर कड़ी
नजर रखनी चाहिये।
- सर्वप्रथम अपने आप को उचित मार्ग पर लगाएं, तब दूसरों को उपदेश दें।
बुद्धिमान मनुष्य को चाहिए कि वह दूसरे को निन्दा का अवसर न दे। 10. अपने आपको नियन्त्रित करना कठिन है_ जैसा वह दूसरों को उपदेश देता है,
यदि कोई मनुष्य उस अनुरूप चलकर अपने को भलि-भाँति संयमित कर तो
वह दूसरों पर भी नियन्त्रण रख सकेगा।
- मनुष्य स्वयं पाप करता है और स्वयं भोगता है और स्वयं ही परिशुद्ध होता है। शुद्धि
और अशुद्धि दोनों ही व्यक्तिगत हैं कोई किसी दूसरे को परिशुद्ध नहीं कर सकता। 12. यद्यपि कोई युद्ध में हजारों-लाखों लोगों को जीत सकता है, पर जो कोई स्वयं
को जीत ले, वह ही योद्धाओं में महानतम है।
- सर्वप्रथम अपने आपको उचित मार्ग पर लगाए, तब दूसरों को उपदेश दे। बुद्धिमान
मनुष्य को चाहिए कि वह दूसरों को निन्दा का अवसर न दे। 14. यदि कोई जैसा वह दूसरों को उपेदश देता है, स्वयं उसके अनुरूप चले, अपने
आपको भली-भाँति संयमित करे, तो वह दूसरों पर भी नियंत्रण रख सकेगा।