331
उसका जीवन सुखी माना जाता है, दुस्साहसी और दुष्ट व्यक्ति, उसका जीवन
सुखी माना जाता है।
- किन्तु एक विनम्र मनुष्य के लिये जीवन जीना कठिन है, जो सदैव पवित्रता की
खोज में रहता हो जात अनासक्त, शान्त, निर्मल और बुद्धिमान हो, ऐसे मनुष्य
का जीवन सुखी नहीं माना जाता।
- वह जो जीवन-हिंसा करता है, जो झूठ बोलता है, जो संसार में बिना दी हुई
वस्तु लेता है, जो पर-स्त्री गमन करता है।
- और जो मनुष्य शराब आदि नशीले पेय पदार्थ का सेवन करता है, वह यहीं
इस संसार में अपनी कब्र अपने आप खोदता है।
- हे मनुष्य! यह जान लो कि असंयत की अवस्था अच्छी नहीं रहती, उससे
सावधान रहो कि लोभ और पाप-कर्म तुम्हें लम्बे समय तक दुख में ही न डाले
रहें।
- संसार या तो किसी को श्रद्धा से देता है या किसी को खुशी से देता है। यदि
मनुष्य दूसरे को मिलने वाले भोजन और पानी को देखकर चिढ़ता है, तो उसे
न दिन को चैन मिलेगा और न ही रात को।
- जिसके मन की ऐसी भावना नष्ट हो गयी है और जड़-मूल से उखाड़ ली गयी
है, उसे दिन को भी चैन नहीं मिलेगा और न रात को भी।
- राग के समान कोई अग्नि नहीं और लोभ के समान कोई ओघ (बाढ़) नहीं
है।
- दूसरे के दोष आसानी से दिखाई देते हैं, किन्तु अपने कठिनाई से। मनुष्य दूसरों
के दोषों को भूसे के समान उड़ाता है, किन्तु आपके दोषों को वैसे ही छिपाता
है, जैसे कि एक धोखेबाज जुआरी पांसे को।
- जो मनुष्य दूसरों के दोषों को ही देखता रहता है और सदैव रुष्ट रहने की ओर
प्रवृत्त रहता है, उसके आस्रव बढ़ते ही जाएंगे और वह आस्रवों के क्षय से बहुत
दूर हो जाता है।
- सभी पापों से बचो, कुशल कर्मों का पोषण करो और अपने विचारों को शुद्ध
करो। यही बुद्ध की शिक्षा है।
6. स्वयं के बारे में और स्व-विजय के विषय में
- यदि किसी में अपनापन है, तो उसे स्व-विजय का अभ्यास करना चाहिए।
- यह बौद्ध जीवन-मार्ग है।