7. बुद्धि, न्याय और सुसंगति - Page 363

334 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय

  1. बुद्धिमान लोग, धम्म सुन लेने के पश्चात् एक गहरी, शान्त और स्थिर झील

के समान शान्त हो जाते हैं।

  1. सत्पुरुष निस्संदेह सभी परिस्थितियों में सावधानी से चलते रहते हैं, इच्छाओं की

तृप्ति के लिए कभी मुँह नहीं खोलते हैं, भले ही सुख या दुख का अनुभव हो

या बुद्धिमान लोग कभी भी खिन्न प्रतीत नहीं होते।

  1. मूर्ख मनुष्य इसे जब तक शहद के समान मधुर समझता है, तब तक पाप-कर्म

परिपक्व नहीं होता है। किन्तु जब पाप-कर्म परिपक्व हो जाता है, तब मूर्ख

दुखी होता है।

  1. जब मूर्ख आदमी पाप-कर्मों को करता है, तो वह नहीं जानता कि मैं पाप-कर्म

कर रहा हूँ, किन्तु वह पापी मनुष्य बाद में आग के समान स्वयं अपने दुष्कर्मां

से जलता है।

  1. जागने वाले की रात लम्बी होती है_, थके हुए मनुष्य का योजन लम्बा होता

है, सच्चे धम्म को न जानने वाले मूर्ख मनुष्य का जीवन लम्बा होता है। 14. यदि किसी यात्री को कोई उससे श्रेष्ठ या समान व्यक्ति न मिले तो उसे अकेला

ही अपने जीवन-पथ पर दृढ़तापूर्वक चलना चाहिये। मूर्ख की संगति अच्छी

नहीं।

  1. ‘‘यह मेरा पुत्र है और यह मेरी सम्पत्ति है’’, इन्हीं विचारों के साथ मूर्ख दुखी

होता रहता है। जिसका अपना आप ही अपना नहीं है_ उसका कहाँ पुत्र और

कहाँ सम्पत्ति?

  1. जो मूर्ख अपनी मूर्खता को जानता है, कम से कम वह वहाँ तक वह पंडित है।

किन्तु जो मूर्ख स्वयं को पंडित समझता है, निस्संदेह वह एक मूर्ख होता है। 17. एक मूर्ख व्यक्ति भले ही अपने पूरे जीवन भर एक बुद्धिमान मनुष्य के साथ

रहे, तो भी तनिक भी सद्धर्भ को नहीं जान पाता, जैसे एक चम्मच सूप के

स्वाद को।

  1. लेकिन एक मेधावी मनुष्य केवल थोड़ी देर के लिये एक बुद्धिमान मनुष्य की

संगति करे, तो वह शीघ्र ही सद्धर्भ को जान लेता है, जैसे जिह्वा सूप के स्वाद

को जान लेती है।

  1. अल्प समझ वाले मूर्ख स्वयं अपने सबसे बड़े शत्रु होते हैं, क्योंकि वे ऐसे

पाप-कर्मों को करते हैं, जिनसे कड़वे फल उत्पन्न होते हैं। 20. उस कार्य का करना अच्छा नहीं, जिसके लिए आदमी को पछताना पड़े और

जिसका फल रोते हुए आँसुओं से भरे मुख से भोगना पड़े।