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- वह कार्य अच्छा है, जिसके कर चुकने के बाद मनुष्य को पछताना न पड़े और
जिसका फल आदमी प्रसन्नता और प्रफुल्लता से भोग सके। 22. जब तक कि पाप-कर्म फलित नहीं होता, तब तक मूर्ख आदमी उसे मधु के
समान मधुर समझता रहता है, किन्तु जब यह परिपक्व होता है, तब मूर्ख दुखी
होता है।
- छिपा हुआ पाप-कर्म प्रकट होने के उपरान्त जब मूर्ख के लिये दुख का कारण
बनता है, तब वह उसके उज्ज्वल भाग्य को नष्ट कर देता है, बल्कि उसके
सिर के टुकड़े-टुकड़े कर देता है।
- झूठे यश की कामना, भिक्षुओं के मध्य वरीयता, विहारों में प्रभुत्व और अन्य
लोगों के मध्य पूजायमान होने की इच्छा एक मूर्ख को छोड़ देनी चाहिए। 25. मनुष्य के बाल पक जाने से ही वह ‘वृद्ध’ नहीं होता, उसकी आयु प्रौढ़ हो
सकती है, किन्तु वह ‘व्यर्थ बूढ़ा हुआ’ कहलाता हैं।
- जिसमें सत्य, शील, करुणा, संयम और नियन्त्रण है, वह जो अशुद्धि से मुक्त
है और बुद्धिमान है, वह ही वास्तव में वृद्ध कहलाता है।
- एक ईर्ष्यालु, कंजूस और धोखेबाज मनुष्य केवल अधिक बोलने कारण या अपने
वर्ण की सुन्दरता द्वारा आदरणीय नहीं बन जाता है।
- जिसमें ये सब दुर्गुण नष्ट हो गए हैं और जड़-मूल से उखाड़ दिये गये हैं, वह
घृणा से मुक्त हो गया है और बुद्धिमान है, वही आदरणीय कहलाता है। 29. एक मनुष्य यदि वह किसी मसले को जोर-जबरदस्ती द्वारा पूरा करा लेता है,
उससे वह न्यायशील नहीं माना जाता है, न वह उचित और अनुचित दोनों
को पहचानता है, वह जो शिक्षित है और ऐसा हिंसा द्वारा नहीं, बल्कि उसी
धर्मानुसार दूसरों का मार्ग-दर्शन करता है। धर्मरक्षक और प्रबुद्ध होते हुए, वही
न्यायशील कहलाता है।
- एक मनुष्य केवल इसलिये विद्वान नहीं है, क्योंकि वह बहुत बोलता है। जो
धैर्यवान है, घृणा और भय से मुक्त है, वही विद्वान कहलाता है। 31. एक मनुष्य इसलिये धम्म का समर्थक नहीं है, क्योंकि वह बहुत बोलता है,
यदि उस मनुष्य ने थोड़ा सीखा है, किन्तु धम्म को सांगोपांग देखा है वह धम्म
का समर्थक है। वह मनुष्य कभी धम्म की उपेक्षा नहीं करता है। 32. यदि मनुष्य को एक विवेकपूर्ण एवं बुद्धिमान साथी मिलता है, जो उसके साथ
यदि चले और मर्यादित जीवन व्यतीत करे, तो उस खतरे को पार करते हुए
विचारशील रहते हुए वह उसके साथ सुखपूर्वक रह सकता है।