2. पुत्री पुत्र से अच्छी हो सकती है - Page 375

346 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय

परिच्छेद-एक

गृहस्थों के लिए प्रवचन

1. सुखी-गृहस्थ

  1. एक बार अनाथपिण्डिक जहाँ तथागत थे, वहाँ आया। तथागत को प्रणाम किया

और आसन ग्रहण कर बैठ गया।

  1. अनाथपिण्डिक यह जानने का इच्छुक था कि एक गृहस्थ कैसे सुखी रह सकता है।
  2. तदनुसार अनाथपिण्डिक ने तथागत से प्रार्थना कि वे उसे गृहस्थ-जीवन के सुख

का रहस्य समझाएँ।

  1. तथागत ने कहा, कि गृहस्थ पहला सुख सम्पत्ति का मालिक होना होता है। एक

गृहस्थ बड़े परिश्रम से न्यायोचित और धार्मिक तरीके से अर्जित, बाहुबल से

संचित तथा (माथे का) पसीना बहाकर उपार्जित सम्पत्ति का मालिक होता है।

मैं ‘न्यायोचित रूप से अर्जित सम्पत्ति का स्वामी हूँ’ इस प्रकार विचार करके

वह सुख पाता है।

  1. दूसरा सुख सम्पत्ति भोगने का सुख है। एक गृहस्थ बड़े परिश्रम से न्यायोजित और

धार्मिक तरीके से अर्जित, बाहुबल से संचित तथा (माथे का) पसीना बहाकर

उपार्जित सम्पत्ति का स्वामी होता है, अपनी सम्पत्ति का उपभोग करता है और पुण्य

के कर्म करता है। अतः इस विचार से कि मैं न्यायोजित रूप से अर्जित अपनी

सम्पत्ति से पुण्य-कर्म कर रहा हूँ, इसके परिणामस्वरूप वह सुख पाता है। 6. तीसरा सुख ‘ऋण’ से ग्रस्त न होने का है। एक गृहस्थ के सिर पर किसी का

भी कम या अधिक ऋण नहीं है, इसलिये सुख पाता है। इसलिये वह इस विचार

से कि ‘मैं किसी भी व्यक्ति का ऋणी नहीं हूँ’ वह इसके परिणामस्वरूप सुख

पाता है।

  1. चौथा सुख निर्दोषता है। एक गृहस्थ जो शरीर के कर्मों से निर्दोष, वाणी से

निर्दोष है और विचार से निर्दोष है, तो उसे निर्दोषता का सुख प्राप्त होता है। 8. अनाथपिण्डिक! वस्तुतः ये चार प्रकार के सुख गृहस्थ द्वारा निरन्तर प्राप्त करने

योग्य हैं, यदि वह उनके लिये प्रयास करता है।

2. पुत्री पुत्र से अच्छी हो सकती है

  1. जब तथागत एक बार श्रावस्ती में ठहरे हुए थे, कोशल नरेश प्रसेनजित् उनसे

मिलने आया था।