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योग्य, सच्चा मनुष्य, मृदुभाषी, दयालु स्वभाव, अहंकार से रहित, एक सरल, कृतज्ञ
अतिथि, सन्तुष्ट रहने वाला, अल्पकृत्य इन्द्रिय विजयी, बुद्धिमान, इन्द्रियसंयत,
प्रत्युत्पन्नमतित्व, अप्रगल्भ कभी हठी नहीं, सिद्ध करने की आवश्यकता है।
और वह कभी नीचा या निम्न आचरण की ओर न झुके, जिसकी गंभीर लोग
भर्त्सना कर सकें।’’
- ‘‘सभी प्राणियों का कल्याण हो और शान्ति से परिपूर्ण रहें, सभी सदैव शान्ति
से धन्य रहें, सभी प्राणी दुर्बल हों या सबल, सभी प्राणी बड़े हों या छोटे_ प्राणी
दृश्य हों या अदृश्य, पास हों या दूर रहने वाले जन्में हो या जन्म की प्रतीक्षारत
सभी शान्त हों।’’
- ‘‘कोई भी अपने साथियों का कहीं भी निरादर न करें_ कोई भी क्रोध या
घृणा में दूसरों की हानि न चाहे।’’
- ‘‘जिस तरह एक माँ अपने प्राण न्यौछावर करके भी अपने इकलौते बच्चे की
चोट से रक्षा करती है, ठीक वैसी ही अपनी भावना सभी सजीव प्राणियों के
लिये करें। ऊपर, नीचे चारों ओर पूरे ब्राह्माण्ड में सभी के लिए प्रेम, मैत्री
भावना रखें, जिसमें घृणा का लवलेश न हो, शत्रुता को प्रोत्साहन न मिले।’’
- ‘‘अतः खड़े होते समय, चलते समय या बैठे रहते समय या लेटे रहते समय
अपने पूर्व सामर्थ्य से यही भावना रखें। यही ‘ब्रह्म-विहार’ माना गया है।