380 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय
कोसल का राजा प्रसेनजित् कुशल धम्म का साथी है। अब पराजित होने के
कारण प्रसनेजिंत् रात भर दुखी रहेगा।’’
- ‘‘विजय वैर उत्पन्न करती है_ पराजित् दुखी जीवन व्यतीत करता है, किन्तु जो
कोई भी उपशान्त और रामरहित है वह विजय और पराजय की चिन्ता नहीं,
वह सुखपूर्वक जीवन व्यतीत करता है।’’
- पुनः ऐसा हुआ ये दोनों राजा दूसरी बार युद्ध-भूमि में भिड़े किन्तु इस युद्ध में
कोशल राजा प्रसेनजित् ने अजातशत्रु को पराजित कर दिया और उसे जीवित
पकड़ लिया। तब राजा प्रसेनजित् ने सोचा, ‘‘यद्यपि अजातशत्रु, ने मुझे क्षति
पहुँचाई है, जबकि मैं उसको क्षति नहीं पहुँचा रहा था, फिर भी वह मेरा भानजा
है। कैसा हो यदि उसे अकेला जीवित छोड़ दूँ किन्तु मैं उसकी सम्पूर्ण सेना,
हाथी, घोड़े, रथ और पैदल जब्त कर लूँ’’ और उसने वैसा ही किया। 7. श्रावस्ती ने भिक्षाटन करके लौटते हुए भिक्षुओं ने तथागत को इस विषय में
अवगत कराया। उस पर तथागत ने कहा, ‘‘एक मनुष्य अपने स्वार्थ के लिए
दूसरे की हानि कर सकता है, ठीक वहाँ तक, जब तक कि उससे उसका लाभ
होता है, किन्तु जब उसकी दूसरों द्वारा हानि पहुँचाई जाती है, वह हानि प्राप्त
हुआ, फिर भी पुनः हानि पहुँचाता है।’’
- ‘‘जब तक पाप-कर्म के फल नहीं देते हैं, तब एक मूर्ख आनन्द मना सकता
है, किन्तु जब पाप-कर्म फल देने लगते हैं, तब वह दुखी होता है।’’ 9. हत्यारे को हत्यारा मिल जाता है। विजेता को पराजित करने वाला मिल जाता
है, गाली देने वाले को दूसरा गाली देने वाला मिल जाता है। 10. ‘‘इस प्रकार कर्म के विकास के द्वारा, एक मनुष्य जो लूटता है वह अपनी बारी
में लुट भी जाता है।’’
5. युद्ध-विजेता के कर्त्तव्य
- जब युद्ध में विजेता व्यक्ति शान्ति स्थापित कर लेता है, तो फिर भी वह पराजित
मनुष्य को दास न भी बनाये, तो भी उसे आगे अपमानित करने के अधिकार
का दावा करता है। भगवान् बुद्ध का इस विषय पर पूर्णतया भिन्न दृष्टिकोण
था। उनके दृष्टिकोण से यदि शान्ति का कोई अर्थ है, तो वह है कि विजेता
का कर्त्तव्य है कि वह अपनी विजय का उपयोग पराजित की सेवा के लिये
करे। भिक्षुओं को उन्होंने यह भी कहाः
- ‘‘जब शान्ति-प्राप्ति कर ली गयी हो, युद्ध-कौशल में निपुर्ण मनुष्य को एक