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- विहार से निष्कासन के उपरान्त अब्भान कर्म हो सकता था। अब्भान कर्म का
अर्थ विघटन का निराकरण है। यह परिवास कर्म के उचित क्रियान्वयन से
सन्तुष्ट होने और संघ द्वारा क्षमा-दान दिये जाने के उपरान्त हो सकता था।
8. भिक्षु और अपराध-स्वीकरण
- भिक्षुओं के संगठन के सम्बन्ध में तथागत द्वारा स्थापित सबसे मौलिक और
विशिष्ट अपराध-स्वीकृति संस्था थीं, जिसे उपोसथ कहते थे। 2. तथागत ने स्पष्ट अनुभव किया था कि जिन्हें उन्होंने अपराधों के रूप में प्रस्तुत
किया था, उनके लागू करना सम्भव था। किन्तु कुछ दूसरे प्रतिबन्ध भी प्रस्तुत
किये गए थे, जो अपराध नहीं थे। उन्होंने कहा कि चरित्र-निर्माण और चरित्र
को बनाये रखने के लिए ऐसे प्रतिबंधों का होना आवश्यक है। यह भी देखना
उतना ही आवश्यक है कि उनका पालन होता है या नहीं।
- किन्तु तथागत उन्हें लागू करने के लिये कोई प्रभावशाली तरीका नहीं खोज
सके थे। अतः उन्होंने खुले में अपराध-स्वीकरण को भिक्षुओं के अन्तर्मन को
संगठित करने और उसे गलत या मिथ्या कदम उठाने के विरुद्ध कार्य करने
वाला स्वयं की रक्षा में एक प्रहरी के रूप में साधन माना।
- अपराध-स्वीकृति प्रतिबन्धों के उल्लंघन (जिन्हें पातिमोख कहा जाता था) तब
सीमित था जिन्हें ‘प्रातिमोक्ष’ कहा गया था।
- उपोसथ (अपराध-स्वीकरण) के लिये एक सीमा के भीतर भिक्षुओं की एक
जगह एकत्रित का होना आवश्यक है। एक पक्ष (अर्धमास) में ऐसी तीन सभायें
हो सकती थीं-चतुर्दशी, पंचदशी और अष्टमी के दिन। उस दिन भिक्षु लोग
उपवास रख सकते हैं। इसलिये ही वह दिन उपोसय भी कहलाता है। 6. उपोसथ होने पर एक भिक्षु पातिमोख में समाहित ‘‘मैं समझता हूँ कि आप
में से किसी ने भी इस नियम का उल्लंघन नहीं किया है, इसलिये आप चुप
हैं।’’ वह यह बात तीन बार कहता है। अब अगले प्रतिबन्ध पर पहुँचता है। 7. भिक्षुनी संघ की भी इसी के समान उपोसथ बैठक करनी होती है। 8. अपराध-अस्वीकरण के उपरान्त ‘आरोप’ और परीक्षण हो सकता है। 9. यदि कोई अपराध न करे, तो कोई भी भिक्षु एक उल्लंघन की सूचना दे सकता
है और यदि इसका कोई प्रत्यक्षदर्शी हो तो उसके आरोप का पुनः परीक्षण हो
सकता है।