6. भिक्षु और शिष्टाचार के नियम - Page 419

390 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय

6. भिक्षु और शिष्टाचार के नियम

  1. एक भिक्षु को अच्छा और शिष्टाचार का व्यवहार करना चाहिये। उसे अपने

आचरण की रीति और व्यवहार में एक आदर्श मनुष्य होना चाहिये। 2. इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिये तथागत ने शिष्टाचार सम्बंधी कुछ नियम बनाये थे। 3. ये शिष्टाचार के नियम ‘सेखिय-धम्म’ कहलाते थे। उनकी संख्या पिचहत्तर है।

7. भिक्षु और अपराध-परीक्षण

  1. इन नियम मात्र ‘विधान’ बनाकर एक औपचारिकता ही नहीं थी। वे वास्तविक

अर्थ में कानून ही थे, जिनमें निश्चित आरोप, परीक्षण और दण्ड समाहित रहते

थे।

  1. कोई भी भिक्षु एक विधिवत संघटित न्यायालय के परीक्षण के बिना दण्डित

नहीं किया जा सकता था।

  1. न्यायालय उन भिक्षुओं द्वारा संघटित किया जाता था, जो उस स्थल के निवासी

होते थे जहाँ एक अपराध घटित हुआ होता था।

  1. न्यायालय को संघटित करने के लिये आवश्यक भिक्खुओं की उचित संख्या के

बिना कोई भी परीक्षण नहीं हो सकता।

  1. कोई भी परीक्षण बिना किसी निश्चित आरोप के कानूनी नहीं हो सकता।
  2. कोई भी परीक्षण कानूनी नहीं हो सकता। यदि वह आरोपी की उपस्थिति में

नहीं घटित होता।

  1. कोई भी परीक्षण कानूनी नहीं हो सकता, यदि आरोपी को अपने बचाव के लिये

सम्पूर्ण अवसर न दिया गया हो।

  1. एक अपराधी भिक्षु के विरुद्ध निम्नलिखित दण्ड दिये जा सकते थेः-

(i) तर्जनीय कर्म (चेतावनी देकर छोड़ देना)

(ii) नियस्य कर्म (विक्षिप्त-पागल घोषित करना)

(iii) प्रजाजनीय कर्म (संघ से निष्कासन)

(iv) उत्क्षेपनिय कर्म (बहिष्कार)

(v) परिवास कर्म (विहार से निष्कासन)।