1. भगवान् बुद्ध की आदर्श भिक्षु की संकल्पना - Page 422

393

1. भगवान् बुद्ध की आदर्श भिक्षु की संकल्पना

  1. भगवान् बुद्ध ने स्वयं ही भिक्षुओं को कहा था कि वे भिक्षुओं को किस रूप

में देखना चाहते थे। यही है, जो उन्होंने कहा था-

  1. ‘‘जो बिना संयम और सत्य के एवं अपने आपको चित्तमलों से परिशुद्ध किये

बिना, जो काषाय वस्त्र को धारण करता है, वह काषाय वस्त्र धारण करने के

अयोग्य है।’’

  1. ‘‘किन्तु जो संयम और सत्य में सम्पन्न हो, सभी शीलों में प्रतिष्ठित भली-भांति

है एवं जिसने अपने आप को चित्तमलों (काषायों) से परिशुद्ध कर लिया है

वह निस्सन्देह काषाय वस्त्र धारण करने के योग्य है।’’

  1. ‘‘एक मनुष्य केवल इसलिये भिक्षु नहीं कहला सकता, क्योंकि वह दूसरों से

भिक्षा मांग कर खाता है। जब वह सभी प्रकार से धम्म को स्वीकार करता है

तभी भिक्षु कहला सकता है। वह नहीं जो केवल भिक्षाटन करता है।’’ 5. ‘‘शीलवान् है, जो ब्रह्मचारी है, जो संसार में सावधानीपूर्वक गुजरता है, वह

निस्सन्देह एक भिक्षु कहलाता है।’’

  1. ‘‘न केवल अनुशासन और व्रतों से, न केवल पर्याप्त अध्ययन से, न केवल

एक समाधि से प्रविष्ट करने से, न केवल एकान्तवास से उस विमुक्ति के सुख

को अर्जित कर सकता है, जिसका आनन्द कोई भी पृथक-जन कभी नहीं उठा

सकता।’’

  1. जो भिक्षु अपनी वाणी पर नियन्त्रण रखता है, जो बुद्धिमतापूर्वक और शान्तिपूर्वक

बोलता है, जो धम्म का अनुसरण करता है, वह भिक्षु कभी भी सद्धम्म से

पतित नहीं होता।

  1. ‘‘जो ‘धम्म’ में निवास करता है, जो ‘धम्म’ में आनन्दित होता है, जो ‘धम्म’

पर ध्यान लगाता है, जो धम्म का अनुस्मरण करता है, वह भिक्षु कभी भी

सद्धम्म से पतित नहीं होता।’’

  1. ‘‘जो कुछ उसने प्राप्त किया है, उसे उसको तुच्छ नहीं समझना चाहिये, और

न ही कभी दूसरों से ईर्ष्या करनी चाहिये, एक भिक्षु जो दूसरों से ईर्ष्या करता

है, वह चित्त की शान्ति कभी प्राप्त नहीं कर पाता।’’

  1. ‘‘जो भिक्षु यद्यपि अल्प मात्रा से प्राप्त करता है, उसे तुच्छ नहीं समझता, जिस

भिक्षु का जीवन पवित्र और प्रमादी नहीं है। देवता भी उसकी प्रशंसा करते

हैं।’’