1. भगवान् बुद्ध की आदर्श भिक्षु की संकल्पना - Page 423

394 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय

  1. ‘‘वह जो कभी भी नाम और रूप से आसक्ति नहीं रखता है और जो किसी

वस्तु या व्यक्ति के न रहने पर तनिक दुख नहीं करता। निस्सन्देह वही यथार्थ

भिक्षु कहलाता है।’’

  1. जो भिक्षु करुणा सहित आचरण करता है, जो बुद्ध के सिद्धान्त में प्रसन्न है, वह

निर्वाण-प्राकृतिक आस्रवों के क्षय से उत्पन्न होने वाले सुख तक पहुँचेगा। 13. ‘‘हे भिक्षु, इस (जीवनरूपी) नाव को खाली कर दो! यदि खाली कर दी

जायेगी, तो इसकी गति तेज हो जायेगी, राग और द्वेष के बंधन काट देने से

तुम निर्वाण की ओर जाओगे।’’

  1. ‘‘पाँच (बंधनों) को काट दो, पाँच का त्याग कर दो, पाँच से ऊपर उठ जाओ।

एक भिक्षु जिसने पाँच बन्धनों से मुक्ति प्राप्त कर ली है, वह ‘ओद्यतीर्ण’

कहलाता है अर्थात् बाढ़ से सुरक्षित।’’

  1. हे भिक्षु! ध्यान लगाओ और सावधान रहो, ताकि तुम्हारा चित्त काम-सुखों में

ही न घूमता रहे, लग सकता, जो सुख देते हैं।

  1. ‘‘बिना प्रज्ञा के कोई ध्यान नहीं, बिना ध्यान के कोई ज्ञान नहीं। वह जिसके

पास ज्ञान और ध्यान है वहीं निर्वाण के समीप है।’’

  1. ‘‘जो भिक्षु अपने एकान्त-वास में प्रवेश कर चुका है, और जिसका चित्त शान्त

है, जब वह स्पष्टतया धम्म का साक्षात्कार करता है। उसे मनुष्येतर सुख का

अनुभव होता है।’’

  1. ‘‘एक बुद्धिमान भिक्षु के लिये इन्द्रिय-संयम, संतोष, धम्म के अधीन संयमित,

अप्रमादी मित्रों की संगति, पवित्र जीवन, अप्रमादी होना ही श्रेष्ठ है।’’ 19. ‘‘उसे भिक्षा पर जीवन व्यतीत करना चाहिये, जो अपने कर्त्तव्य-पालन में अप्रमाद

नहीं करेगा, तभी सुख की पूर्णता में वह दुख का अंत करने में सफल होगा।’’ 20. ‘‘हे भिक्षु! स्वयं अपने को जागरूक एवं उत्साहित कर, स्वयं अपने का परीक्षण

कर, इस प्रकार जब तू स्व-सुरक्षित और एकाग्र होगा तो सुख से जिएगा।’’ 21. ‘‘क्योंकि अपने आप ही अपना स्वामी है, अपने आप ही अपनी गति है, इसलिये

अपने आप को उसी तरह नियंत्रण में रख, जिस प्रकार व्यापारी अच्छे घोड़े को

नियंत्रण में रखता है।’’

  1. ‘‘जो भिक्षु अप्रमाद में आनन्दित रहता है, जो प्रमाद को भय की दृष्टि से

देखता है, वह अग्नि के समान अपने सभी छोटे या बड़े बंधनों को जलाता

हुआ विचरता है।’’