4. भिक्षु और उपासक - Page 432

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  1. एक आदर्श के लिए अवश्य ही ‘व्यावहारिक’ चाहिये और इतना ही नहीं यह

लोगों को ‘व्यावहारिक’ प्रतीत भी होना चाहिये। केवल तब ही लोग उसके

लिये प्रयास करेंगे और उसे साकार करने की कोशिश करेंगे। 13. इस तरह का प्रयास तभी आरम्भ हो सकता है, जब लोगों के दिमाग के सामने

उस आदर्श पर आधारित कार्यरत एक समाज का यथार्थ रूप हो, जिससे कि

सामान्य मनुष्य को यह समझ आ सके कि आदर्श अव्यवहारिक नहीं थे, बल्कि

इसके विपरीत साकार करने योग्य थे।

  1. संघ उसी का एक साकार सामाजिक नमूना है, जो तथागत द्वारा उपदेशित धम्म

को साकार कर बनाया गया था।

  1. यही कारण है कि तथागत ने एक भिक्षु के धर्म और धर्म में उपासक के यह

विभाजक रेखा खींची थी। भिक्षु बुद्ध के आदर्श समाज का दीप-वाहक था और

भिक्षु को यथा सामर्थ्य उसका अनुसरण करना था।

  1. एक अन्य प्रश्न और भी है, जिसे एक उत्तर की आवश्यकता है। भिक्षु के क्या

कार्य होते हैं?

  1. क्या भिक्षु को स्वयं की साधना के लिए ही या उसे लोगों की सेवा करनी और

उन्हें मार्ग-निर्देशित करना चाहिये।

  1. उसे अवश्य ही दोनों कार्यों को पूरा करना चाहिये।

  2. व्यक्तिगत साधना के बिना वह मार्गदर्शन के योग्य नहीं हो सकता। इसलिये उसे स्वयं

को एक सम्पूर्ण, सर्वश्रेष्ठ, सदाचरण वाला मनुष्य और एक प्रबुद्ध मनुष्य अवश्य

बनना चाहिए। इसलिए उसे व्यक्तिगत साधना का अभ्यास करना चाहिये। 20. एक भिक्षु अपने घर का परित्याग करता है, किन्तु वह संसार का त्याग नहीं

करता है। वह गृह-त्याग करता है, जिससे कि उसके पास स्वतंत्रता और अवसर

हो उनकी सेवा करने के लिये जो अपने घरों से बुरी तरह आसक्त है, और

उनका जीवन दुख, विपत्ति और अमंगल से भरा हुआ है और जो स्वयं अपनी

सहायता नहीं कर सकते।

  1. करुणा, जो कि धम्म का सार है, की आवश्यकता होती है कि प्रत्येक व्यक्ति

प्रेम और सेवा करे और भिक्षु भी इससे मुक्त नहीं है।

  1. व्यक्तिगत-साधना में चाहे जितना भी परिपूर्ण हो, एक भिक्षु जो मानव-मात्र की

व्यथा से उदासीन है, सरासर एक भिक्षु नहीं है। वह कुछ भी और हो सकता

है, किन्तु वह एक भिक्षु नहीं है।