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1. धम्म-दीक्षा देना भिक्षु का कर्त्तव्य
- यश और उसके चार मित्रों का धम्म में धर्मान्तरित होने का समाचार दूर-दूर
तक फैल गया जिसका परिणाम यह हुआ कि उच्चतम परिवारों से संबंधित
कुल-पुत्र और वे जो उनके निचले दर्जे के परिवारों के हैं, तथागत के पास
शिक्षा और उनके धम्म की शरण ग्रहण करने के लिये आने लगे।
- धम्म की शिक्षा लेने के लिये तथागत के पास लोग आने लगे थे। भगवान् बुद्ध
जानते थे कि उनके लिये यह कठिन था कि वे प्रत्येक को व्यक्तिगत रूप
से सुशिक्षित कर सकें। उन्होंने संघ की आवश्यकता का अनुभव किया था।
भिक्षुओं के रूप में संगठन बनाने की संख्या दिन-ब-दिन बढ़ती जा रही थी,
एक धार्मिक संगठन के रूप बनता जा रहा था, जिसे उन्होंने परिव्राजकों का
संघ कहा था।
- इसलिये उन्होंने परिव्राजकों को संघ का सदस्य बनाया और अनुशासन के नियम
निर्धारित किये, जो विनय कहलाये थे और उन्हें संघ के सदस्यों के लिए
अनिवार्य बना दिया था।
- तथागत ने आगे चलकर एक भिक्षु बनने से पहले एक शिष्य के लिए दो
अवस्थाओं से गुजरना आवश्यक कर दिया। पहले एक शिष्य एक परिव्राजक
बनता था और एक भिक्षु के साथ कुछ वर्षों तक उसके अधीन प्रशिक्षण पाते
हुए एक परिव्राजक बना रहता था। उसके प्रशिक्षण काल की समाप्ति के पश्चात्
उसे उपसम्पदा ग्रहण करने की आज्ञा मिल जाती थी। यदि उसने परीक्षकों को
संतुष्ट कर दिया कि वह इसके लिये योग्य है।
- धम्म की प्रारम्भिक अवस्था में ऐसी व्यवस्था को करने के लिये कोई समय
नहीं था। इसलिये भगवान् ने, उन्हें ‘भिक्षु’ बना दिया और उन्हें धम्म-दूत के
रूप में धम्म का प्रचार करने के लिये बाहर भेज दिया।
- और उन्हें बाहर भेजने से पहले तथागत ने भिक्षुओं से कहा ‘‘हे भिक्षुओ! मैं
मानवीय और दिव्य, सभी बन्धनों से मुक्त हूँ, हे भिक्षुओ! तुम भी मानवीय
और दिव्य, सभी बन्धनों से मुक्त हो। अब तुम जाओ, और बहुत जनों के हित
के लिये, बहुत जनों के सुख के लिये, लोक पर अनुकम्पा करने के लिये_
देवताओं और मनुष्यों के हित के लिये, सुख के लिये और कल्याण के लिये
चारिका करो।’’