413
तुम्हारी आत्म-विजय के मार्ग में बाधक होगा। जब बाहरी लोग मेरी या धम्म
की या संघ की प्रशंसा में बोलें तुम्हें स्वीकार करना चाहिये जो तथ्य होने के
कारण नहीं है। यह कहते हुए ‘इस या उस कारण से यह तथ्य है, वह ऐसा
है, ऐसी बातें हमारे मध्य पायी जाती हैं यह हम में हैं।’’’
4. भिक्षु को धम्म-प्रचार के लिए संघर्ष करना चाहिए
भिक्षुओ को संबोधित करते हुए तथागत एक बार बोलेः-
‘‘हे भिक्षुओ! यह मैं नहीं हूँ जो संसार से विवाद करता हूं, बल्कि संसार है जो
मुझसे विवाद करता है। सत्य का एक उपदेशक संसार में किसी से भी विवाद
नहीं करता है।’’
- ‘‘योद्धा, योद्धा हम अपने आप को कहते हैं। तथागत! तब हम किस तरह से
योद्धा हैं?’’
‘‘हे भिक्षुओ! हम युद्ध करते हैं, इसलिये हम योद्धा कहलाते हैं।’’
‘‘तथागत! हम किसलिये युद्ध करते हैं?’’
‘‘भिक्षुओ! उच्च शीलों के लिये, श्रेष्ठ उद्यम के लिये, उदत्त प्रज्ञा के लिए-इन
बातों के लिये हम युद्ध करते हैं इसलिये हम योद्धा कहलाते हैं।’’ 7. जहां शील खतरे में हो संघर्ष से मत घबराओ, मृदुभाषी मत बने रहो अर्थात्
ऐसे समय भीगी बिल्ली बने मत बैठे रहो।