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1. भिक्षा का बंधन
- भिक्षु एक संगठित संस्था थी, जिसकी सदस्यता सबके लिये खुली नहीं थी।
- मात्र एक परिव्राजक होना संघ की सदस्यता लेने के लिये पर्याप्त नहीं था।
- केवल परिव्राजक के उपसम्पदा प्राप्त करने के पश्चात् ही वह संघ का सदस्य
बन सकता था।
- संघ एक स्वतंत्र संस्था थी। यहाँ तक कि अपने संस्थापक से भी स्वतन्त्र थी।
- यह स्वायत्त थी। यह जिसे चाहे उसे अपना सदस्य बना सकती थी, यदि उसने
विनय-पिटक के नियमों के विरुद्ध कार्य किया हो, तो यह किसी भी सदस्य
को सदस्यता से हटा सकती थी।
एक मात्र भिक्षा की डोरी हों, भिक्षु को गृहस्थ से बाँधती थी।
भिक्षु भिक्षा पर निर्भर करते थे और यह गृहस्थ ही थे, जो भिक्षा देते थे।
गृहस्थ संगठित नहीं थे।
यह संघ-दीक्षा या संघ में व्यक्ति के प्रवेश के लिये एक संघ का विधान था।
संघ-दीक्षा में संघ तथा साथ ही साथ धम्म में दीक्षित होना दोनों समाहित थे।
जो धम्म में दीक्षित होना चाहते थे, लेकिन संघ के सदस्य नहीं बनना चाहते
थे। उनके लिये कोई पृथक धम्म-दीक्षा नहीं थी। जिसके परिणामों में से एक
था गृहस्थ से गृहत्याग की अवस्था में जाना।
- यह एक गम्भीर चूक थी। यह उन कारणों में से एक थी, जिसने अन्ततोगत्वा
भारत में बौद्ध धर्म के पतन में भूमिका निभाई थी।
- दीक्षा, की इस अनुपस्थिति ने गृहस्थों को एक धर्म से दूसरे धर्म में भटकने के
लिये मक्त छोड़ दिया था, इससे भी बदतर एक ही समय में एक से अधिक
धर्म अपनाने के लिए मुक्त छोड़ा जाना था।
2. पारस्परिक प्रभाव
- यद्यपि, ‘भिक्षा’ का बन्धन भी ऐसा था कि ‘कोई’ भिक्षु गृहस्थों के किसी
भटके हुए सदस्य को सुधारने के लिये पर्याप्त था।