416 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय
- इस सम्बंध में अंगुत्तर निकाय में वर्णित निम्नलिखित नियम ध्यान देने योग्य
हैं।
- इन आदेशों के अतिरिक्त, भी गृहस्थों को किसी भी अनिष्ट या अनाचरण के
लिये एक भिक्षु की दूसरे भिक्षुओ से शिकायत करने का एक सामान्य अधिकार
था।
- जिस क्षण शिकायत भगवान् बुद्ध तक पहुँचती थी और उन्होंने उसकी पुष्टि कर
ली, अब विनय-पिटक में सम्बन्धित नियम संशोधित किया जाता था जिससे ऐसे
किसी अनाचरण की पुनरावृत्ति को, संघ के विरुद्ध एक अपराध माना जाए। 5. विनय, पिटक और कुछ नहीं, बल्कि गृहस्थों की शिकायतों का परिमार्जन मात्र
है।
- भिक्षु और गृहस्थों के मध्य ऐसा सम्बन्ध था।
3. भिक्षु का ‘धम्म’ और गृहस्थ का ‘धम्म’
- बौद्ध धम्म के कुछ आलोचक आरोप लगाते हैं कि बौद्ध धम्म एक धर्म नहीं
है।
- इस प्रकार की आलोचना पर कोई ध्यान देने की आवश्यकता नहीं। यदि कोई
उत्तर देना ही है, तो वह यह है कि बौद्ध धम्म ही एक मात्र वास्तविक धम्म
है और वे जो ऐसा स्वीकार नहीं करते हैं, उन्हें अवश्य ही अपनी धर्म की
परिभाषा बदलनी चाहिए।
- दूसरे आलोचक इतनी दूर तक नहीं जाते, वे कहते हैं, ‘यह बौद्ध धम्म केवल
भिक्षुओं से सम्बन्धित है। यह स्वयं को सामान्य मनुष्य से सम्बन्धित नहीं करता।
बौद्ध धम्म ने सामान्य मनुष्य को अपने घेरे से बाहर ही रखा है। 4. बुद्ध के प्रवचनों में ‘भिक्षु’ शब्द का वर्णन इतनी अधिक बार आता है कि वे
आलोचना को बल देते हैं।
- इसलिये इस विषय को स्पष्ट करना आवश्यक हो जाता है।
- क्या भिक्षुओं और गृहस्थों दोनों के लिये ‘धर्म’ ही था? अथवा धम्म का कोई
ऐसा अंश भी है जो भिक्षुओं के लिये आवश्यक और गृहस्थों के लिए नहीं
है।
- क्योंकि ‘प्रवचन’ प्रायः भिक्खुओं को सम्बोधित किये गये थे, इससे यह अनुमान
नहीं लगाना चाहिए कि जो कुछ उपदेश दिया गया था, वह केवल भिक्षुओं पर