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- ‘‘प्रातः काल, इन व्रतों को पवित्र और श्रद्धा-युक्त मन से ग्रहण करें, बुद्धिमान
रहें और अपनी सामर्थ्य के अनुसार भिक्खुओं को भोजन व पेय पदार्थ दें।’’ 33. ‘‘अपने माता-पिता की भली-भांति सेवा करें, सदाचरण वाला व्यवसाय
अपनायें।
- ‘‘इस प्रकार उपासक, निष्ठावान होकर दिव्य लोक को प्राप्त होगा।’’
- ‘‘इस प्रकार यह देखा जा सकता है कि धम्म (भिक्षु और उपासक) दोनों के
लिये समान था।’’
हाँ, निस्सन्देह, दोनों के प्रति की जाने वाली आशा में अन्तर है।
एक भिक्खु को पाँच व्रत अवश्य लेने चाहिएं।
उसे व्रत लेना चाहिये कि वह कभी झूठ नहीं बोलेगा।
उसे व्रत लेना चाहिए कि वह वध नहीं करेगा।
उसे व्रत लेना चाहिए कि वह दूसरों की सम्पत्ति को अपनी नहीं बनाएगा जो
उसे नहीं दी गयी है।
- उसे व्रत लेना चाहिए कि वह किसी स्त्री के विषय में शारीरिक ज्ञान जानने
का कभी प्रयास नहीं करेगा।
उसे व्रत लेना चाहिए कि वह कभी कोई नशीला पदार्थ नहीं पिएगा।
ये सभी नियम वैसे तो उपासक पर भी लागू होते हैं।
भेद केवल इतना है कि भिक्षु के साथ वे व्रत अनुल्लंघनीय हैं। उपासक के
साथ वे स्वैच्छिक रूप से आदर करने के लिये नैतिक कर्त्तव्य हैं। 45. इसके अतिरिक्त, दो अन्य अन्तर हैं, जो ध्यान देने योग्य हैं। 46. एक भिक्षु के पास निजी सम्पत्ति नहीं हो सकती है, उपासक के पास हो सकती
है।
- एक भिक्षु ‘परिनिर्वाण’ में प्रवेश के लिये स्वतन्त्र हैं। उपासक के लिये निर्वाण
पर्याप्त है।
- एक भिक्षु और उपासक के बीच ये ही समानताएँ और असमानताएँ हैं।
- यद्यपि धम्म दोनों के लिये समान है।