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1. धनवानों के लिए विनय (जीवन-नियम)
(i)
- तथागत ने ‘दरिद्रता’ को ‘जीवन का सौभाग्य’ कहकर उसे ऊपर उठाने का
प्रयास नहीं किया।
- और न ही उन्होंने दरिद्रों को यही कहा कि तुम संतुष्ट रहो, क्योंकि वे पृथ्वी
के उत्तराधिकारी हैं।
- इसके विपरीत, उन्होंने धन-सम्पत्ति का स्वागत किया है। जिस पर उन्होंने
बल दिया वह है कि धन-सम्पत्ति का अर्जन विनय के आधार पर ही होना
चाहिये।
(ii)
- एक बार जहाँ तथागत विराजमान थे वहां अनार्थापण्डिक पहुंचा। उन्होंने तथागत
को प्रणाम किया और एक ओर एक आसन ग्रहण किया और पूछा, ‘‘क्या
तथागत बतायेंगे कौन-सी बातें गृहस्थों के लिये स्वागत योग्य, सुखकर और
अनुकूल हैं, लेकिन जिन्हें प्राप्त करना कठिन है।’’
- तथागत ने अनार्थापिण्डक के पूछे गये प्रश्न को सुन कर कहा, ‘‘ऐसी बातों में
पहली बात है, न्याय-संगत तरीके से धन अर्जित करना।’’
- ‘‘दूसरी बात है यह देखना कि आपके सगे-सम्बन्धी भी न्यायसंगत तरीके से
धन अर्जित करें।’’
- ‘‘तीसरी बात है लम्बे समय तक जीवन जीना अर्थात् दीर्घायु होना।’’
- ‘‘एक सच्चे गृहस्थ के लिये इन तीनों बातों की उपलब्धि जो संसार में स्वागत
योग्य, सुखकर और अनुकूल हैं, किन्तु प्राप्त करने में कठिन हैं, इसके अतिरिक्त
चार बातें शर्तें-करणीय हैं, वे हैं श्रद्धा का आशीर्वाद, शीलाचरण का आशीर्वाद,
उदारता का आर्शीवाद तथा प्रज्ञा का आशीर्वाद।’’
- ‘‘श्रद्धा और विश्वास का आशीर्वाद तथागत के सर्वोच्च ज्ञान में समाहित हैं
जो शिक्षित करता है कि वे भगवान अर्हत हैं, सम्यक् सम्बद्ध हैं, विद्या और
आचरण में परिपूर्ण हैं, सुगत हैं, सभी लोकों के ज्ञाता हैं। अनुत्तर हैं, मनुष्यों
के दमन करने वाले सारथी हैं, देवों और मनुष्यों के शास्ता हैं।’’ 7. ‘‘शीलाचरण का आशीर्वाद प्राणातिपात (जीव-हिंसा), अदिन्नादान (चोरी),
काम-मिथ्याचार (व्यभिचार), मृषावाद (असत्य) और नशीले पेय पदार्थों के
सेवन के पृथक हैं।