422 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय
- ‘‘उदारता का आशीर्वाद समाहित है, गृहस्थ के कृपणता के दोष से मन को
मुक्त रखने, उदार बनने, खुले हाथों से दान देने में आनन्दित होने, दाता बनने
और दान-शील होकर जीवन जीते हैं।’’
- ‘‘प्रज्ञा का आशीर्वाद किसमें समाहित है? तुम जान लो कि एक गृहस्थ जो लोभ,
कृपणता, द्वेष, आलस्य, तन्द्रा, चित्त की व्यग्रता और अनिश्चिता के वशीभूत
रहता है, पाप-धर्म करता है और जो किया जाना चाहिये उसकी उपेक्षा करता
है, इस प्रकार करने से सुख और सम्मान से वंचित रह जाता है।’’ 10. ‘‘लोभ, कृपणता, द्वेष, आलस्य और तन्द्रा, चित्त की व्यग्रता और अनिश्चिता और
संदेह चित्त के दाग हैं। एक गृहस्थ जो चित्त के ऐसे दागों से पीछा छुड़ा लेता है
वह महा-प्रज्ञा, बहुल-प्रज्ञा, निर्मल-दृष्टि और पूर्ण-प्रज्ञा अर्जित कर लेता है।’’ 11. इस प्रकार, न्याय-संगत और उचित तरीके से धन अर्जित करना, बड़े परिश्रम
से अर्जित, बाहुबल द्वारा एकत्रित और पसीना बहाकर प्राप्त धन एक महान्
आशीर्वाद है। ऐसा गृहस्थ स्वयं को सुखी और आनन्दित करता है तथा स्वयं
को सुख से परिपूर्ण बनाये रखता है, साथ ही माता-पिता, पत्नी और बच्चों,
नौकरों और श्रमिकों, मित्रों और साथियों को सुखी और आनन्दित करता है,
तथा उन्हें सुख से परिपूर्ण बनाये रखता है।’’
2. गृहस्थों के लिय विनय (जीवन-नियम)
इस विषय पर भगवान बुद्ध के विचार सिगाल को दिए उसके उपदेश में प्रस्तुत
किये गये हैं।
- एक समय तथागत राजगृह के वेलुवन के कलन्दक-निवाप में विहार कर रहे थे।
- उस समय एक गृहस्थ का पुत्र युवक सिगाल, यथासमय उठकर राजगृह में
बाहर जामकर गीले केशों तथा गीले वस्त्रों के साथ जुड़े हुए हाथों को उठा
कर पृथ्वी व आकाश व सभी दिशाओं, पश्चिम उत्तर, दक्षिण ऊपर और नीचे
को प्रणाम करने लगा।
- और तथागत ने उसी सुबह शीघ्र चीवर धारण किया, अपना पात्र और चीवर
लिया तथा भिक्षाटन के लिये राजगृह में प्रवेश किया। उन्होंने युवक सिगाल
को इस प्रकार प्रणाम करते देखा, तो उससे पूछा, ‘‘तू इस प्रकार पृथ्वी और
आकाश व सभी दिशाओं को प्रणाम क्यों कर रहा है?’’
- ‘‘मृत्युशैया पर पड़े मेरे पिता ने मुझसे कहा था, ‘‘प्रिय पुत्र! तुम पृथ्वी और
आकाश व सभी दिशाओं को प्रणाम करना। अतः मैं, अपने पिता के शब्दों का