1. राजा बिम्बिसार का दान - Page 460

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1. राजा बिम्बिसार का दान

  1. राजा बिम्बिसार तथागत के मात्र एक सामान्य अनुयायी नहीं थे, बल्कि वह एक

महान उपासक और उनके धम्म के एक महान समर्थक भी थे।

  1. स्वयं को गृहस्थ उपासक बनाने के उपरान्त बिम्बिसार ने पूछा, ‘‘तथागत, कृपा

करके भिक्षु संघ सहित कल का अपना भोजन मेरे साथ करने की स्वीकृति

दें?’’

  1. तथागत ने मौन रहकर अपनी सहमति व्यक्त की।

  2. राजा बिम्बिसार ने जब यह समझ लिया कि तथागत ने उनका निमंत्रण स्वीकार

कर लिया है, अपने आसन से उठे, आदरपूर्वक तथागत का अभिवादन किया

और उनकी प्रदक्षिणा करके चले गये।

  1. जब रात बीत गयी, बिम्बिसार ने उत्तम भोजन तैयार करने का आदेश दिया और

यथोचित समय पर तथागत को इन शब्दों में सूचित किया, ‘‘यह उचित समय

है, तथागत! भोजन तैयार है।’’

  1. पूर्वाह्न में तथागत ने अपना चीवर पहन कर अपना भिक्षा-पात्र लिया और चीवर

लेकर सभी पूर्व जटिल भिक्षुओं के साथ राजगृह नगर में प्रवेश किया।

  1. तथागत राजा बिम्बिसार के महल में पहुंचे। वहाँ पहुँचने के उपरान्त, वे उन

भिक्षुओं के साथ, जो उनका अनुसरण कर रहे थे, अपने लिये सुसज्जित आसनों

पर विराजमान हो गये। तब राजा बिम्बिसार ने स्वयं अपने हाथों से बुद्ध प्रमुख

भिक्षु-संघ को भोजन परोसा, और जब तथागत ने अपना भोजन समाप्त कर

लिया और अपना पात्र व अपने हाथ धो लिये, और बिम्बिसार उनके समीप

आ बैठा।

  1. उनके समीप बैठे हुए राजा बिम्बिसार ने सोचा, ‘‘मैं तथागत के रहने के लिये

स्थान की व्यवस्था कहाँ करूँ? जो न तो गाँव से अत्यधिक दूर हो और न

ही अत्यधिक समीप हो, आवागमन के लिये उपयुक्त हो, तथा उन लोगों के

लिये, जो उनके पास आना चाहें, सरलता से सुगम्य हो, दिन में अत्यधिक

भीड़-भाड़ वाला न हो, जहाँ कम शोर-शराबा हो, रात में आवाज न हो, एकान्त

हो, जन-समूह से प्रच्छन्न हो, एकांतवास के जीवन के लिये पूर्णतया उपयुक्त

हो।’’

  1. राजा बिम्बिसार ने सोचा, ‘‘यह वेलुवन है जो मेरा विहार उद्यान है, जो न तो

नगर से अत्यधिक दूर है और न ही अत्यधिक समीप है, आवागमन के लिये