432 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय
उपयुक्त है। कैसा हो यदि मैं बुद्ध प्रमुख भिक्षु-संघ को वेलुवन विहार उद्यान
दान के रूप में अर्पित कर दूँ?’’
- तब राजा बिम्बिसार ने जल से भरा एक स्वर्ण-पात्र लिया, जिसमें बुद्ध के हाथ
में जल डाला और तथागत को यह कहते हुए दान दिया, ‘‘भगवन्! मैं यह
वेलुवन विहार उद्यान, बुद्ध प्रमुख भिक्षु संघ को दान में देता हूँ।’’ तथागत ने
उद्यान स्वीकार किया।
- तब तथागत धार्मिक प्रवचन द्वारा बिम्बिसार को उत्साहित, आनन्दित और
आह्लादित करने के उपरान्त अपने आसन से उठे और चले गये। 12. और इस घटना के परिणामस्वरूप तथागत ने, एक धार्मिक प्रवचन देने के उपरान्त
भिक्षुओं को सम्बोधित किया, ‘‘भिक्षुओ! इस उद्यान विहार को स्वीकार करने
की अनुमति देता हूँ।’’
2. अनाथपिण्डिक का दान
- धम्म-दीक्षा ग्रहण करने के उपरान्त अनाथपिण्डिक एक बार तथागत के पास
गया। अभिवादन के बाद दाहिनी ओर अपना आसन ग्रहण कर, वह बोलेः- 2. ‘‘भगवान्! जानते हैं कि मैं श्रावास्ती में निवास करता हूँ, जो धन-धान्य से
सम्पन्न है और जहाँ शान्ति व्याप्त है। वहाँ महान् राजा प्रसेनजित् का शासन
है।’’
- ‘‘अब मैं वहाँ एक विहार स्थापित करना चाहता हूँ, मैं आपसे निवेदन करता
हूँ कि आप श्रावस्ती आयें और मुझसे यह स्वीकार करें।’’
- तथागत मौन रहे और इस प्रकार दान स्वीकार करने की अपनी सहमति प्रदान
की।
- अनाथपिण्डिक ने जो निस्सहाय का मित्र और अनाथों का सहायक था, घर
लौटकर हरे-भरे और निर्मल जल के स्रोतों से युक्त राजकुमार जेत के उद्यान
को देखा, और सोचाः ‘‘यह वह स्थान है, जो एक विहार के रूप में तथागत
के भिक्षु-संघ के लिये सबसे उपयुक्त रहेगा।’’ और वे राजकुमार के पास गये
और उनसे वह उद्यान खरीदने की अनुमति माँगी।
- राजकुमार उद्यान को बेचने के इच्छुक नहीं था, इसलिये उन्होंने उसका बहुत
अधिक मूल्य लगाया। उन्होंने पहले तो अस्वीकार कर दिया, किन्तु अन्त में
कहाः ‘‘यदि तुम इस स्थल को स्वर्ण-मुद्रा (कार्षापण) से ढँक सको, तो तुम
इसे ले सकते हो और किसी अन्य मूल्य पर नहीं।’’