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करने वालों के लिये है, या रोगी के लिये दवा प्राप्त की होगी, या चावल-दूध
की निरंतर आपूर्ति प्राप्त होगी।’’’
- ‘‘तब मेरे भीतर प्रसन्नता उत्पन्न होगी, इस प्रकार प्रसन्नता से भरा आनन्द मुझे
मिलेगा और इस तरह आनन्दित होने से मेरा सम्पूर्ण शरीर शांति प्राप्त करेगा।
इस प्रकार शांत होने से मुझे सन्तोष की एक सुखद भावना की अनुभूति होगी_
और उस सुख में मेरा मन शांत हो जायेगा। वह मेरे लिये नैतिक बल प्रदान
करेगा, सात सम्बोधि-अंगों का पालन करना होगा! भगवान्! तथागत ने इन आठ
वरदानों को माँगने में स्वयं मेरे ध्यान में ये प्रयोजन थे।’’
- तब तथागत ने कहा, ‘‘यह बहुत अच्छा है, विशाखा! तुमने बहुत अच्छा किया
है कि तुमने इन प्रयोजनों को ध्यान में रखकर तथागत से इन आठ वरदानों
को माँगा है। उन लोगों को दिया गया दान, जो इसके योग्य हैं अच्छी भूमि
में अच्छे बीज डालने के समान हैं, जिससे भरपूर फल प्राप्त होते हैं। किन्तु
उनको दी गयी भिक्षा को अभी भी राग-द्वेषों के वशीभूत एक बंजर भूमि के
बीज डालने के समान है। भिक्षा ग्रहण करने वाले के राग-द्वेष मानो पुण्य की
वृद्धि में बाधक हो जाते हैं।’’
- तब तथागत ने विशाखा के इन शब्दों के प्रति पुण्याभुमोदन किया_ ‘‘तथागत
की उपासिका, जीवन में एक ईमानदार स्त्री, जो कुछ भी दान श्रद्धायुक्त चित्त
से और लोभ रहित होकर देती है, उसका दान दिव्य है, दुख का नाश करने
वाला है और सुख को उत्पन्न करने वाला होता है।’’ वह मार्ग में प्रवेश करने
के उपरान्त दूषित और अपवित्रता से रहित सुखद जीवन रखते हुए, वह सुखी
होती है_ और वह अपने दानशील कर्मों में आनन्दित होती है।’’
- विशाखा ने संघ को पूर्वाराम-विहार दान कर दिया, वह गृहस्थ उपासिकाओं की
बनने वाली प्रथम अध्यक्षा थीं।